...तो अमेरिका की परमाणु भूख रूसी यूरेनियम पर टिकी
- ममता कुशवाहा
पिछले कुछ महीनों से यूक्रेन की सेना रूस की तेल रिफाइनरियों पर लगातार ड्रोन हमले कर रही है और हैरानी की बात यह है कि इन हमलों को रोकने की अपील खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आई। सतही तौर पर देखें तो यह विरोधाभासी लगता है, जो देश रूस पर सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने की बात करता है, वही रूस की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को बचाने की गुहार भी लगा रहा है। लेकिन इस पूरे प्रकरण को गहराई से देखने पर अमेरिका की विदेश नीति का एक ऐसा दोहरा चरित्र उभरकर सामने आता है, जो वैश्विक राजनीति की असली सच्चाई बयां करता है। एक ओर अमेरिका उन देशों पर आर्थिक शिकंजा कसने की कोशिश करता है जो रूस से सस्ता तेल खरीदते हैं, तो दूसरी ओर वह खुद अपने परमाणु ऊर्जा उद्योग के लिए रूस से संवर्धित यूरेनियम की खरीद बेरोकटोक जारी रखे हुए है।
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने रूस से तेल आयात करने वाले देशों को निशाना बनाने के इरादे से कई प्रतिबंधात्मक कानून बनाए। इन कानूनों का मूल मकसद यही था कि युद्ध के दौरान मास्को की तेल राजस्व पर निर्भरता को कम किया जाए, ताकि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़े और वह यूक्रेन पर हमले रोकने को मजबूर हो। लेकिन यही कानून यह भी सुनिश्चित करते हैं कि अमेरिका खुद रूस से वह सामग्री आयात करता रह सके, जो उसके परमाणु ऊर्जा उद्योग के लिए बेहद अहम है। यानी विधेयक में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया गया कि संयुक्त राज्य अमेरिका में आयात होने वाले कम संवर्धित यूरेनियम पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। यह छूट किसी संयोग का नतीजा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है, क्योंकि अमेरिका जानता है कि उसका परमाणु ऊर्जा तंत्र रूसी यूरेनियम के बिना डगमगा सकता है।
अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग के आंकड़े इस निर्भरता की गहराई को उजागर करते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका द्वारा रूस से समृद्ध यूरेनियम का आयात लगातार बढ़ा है- 2022 में यह 829.75 मिलियन डॉलर था, जो बढ़कर 2025 तक 1026.78 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो उस वर्ष के कुल संवर्धित यूरेनियम आयात का करीब साढ़े तेईस फीसदी हिस्सा है। दिलचस्प बात यह है कि केवल ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड ही ऐसे देश हैं जिन्होंने रूस से भी अधिक यूरेनियम अमेरिका को आपूर्ति किया। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि रूस अमेरिका के परमाणु ईंधन चक्र में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता है, भले ही राजनीतिक स्तर पर दोनों देशों के रिश्ते बेहद तल्ख हों।
इस निर्भरता को समझने के लिए यूरेनियम के संवर्धन की तकनीकी प्रक्रिया को जानना जरूरी है। प्राकृतिक यूरेनियम मुख्यतः दो समस्थानिकों- यू-235 और यू-238 से मिलकर बना होता है। प्राकृतिक रूप में यूरेनियम-235 का अनुपात महज 0.7 फीसदी होता है, जबकि शेष 99.3 फीसदी यूरेनियम-238 होता है, जो विखंडन प्रक्रिया में सीधे योगदान नहीं देता। चूंकि परमाणु रिएक्टरों में ऊर्जा उत्पादन के लिए यू-235 की अधिक आवश्यकता होती है, इसलिए अपरिशोधित यूरेनियम को संवर्धित करना पड़ता है ताकि उसमें यू-235 का अनुपात तीन से पांच फीसदी तक पहुंच सके। यही संवर्धित यूरेनियम, जिसे कम संवर्धित यूरेनियम यानी एलईयू कहा जाता है, अमेरिका के परमाणु रिएक्टरों का मुख्य ईंधन है।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, देश में मौजूद 96 रिएक्टरों को प्रतिवर्ष लगभग दो हजार मीट्रिक टन कम संवर्धित यूरेनियम की जरूरत होती है। लेकिन अमेरिका की घरेलू संवर्धन क्षमता बेहद सीमित है, जिसके चलते उसके 98 गीगावाट क्षमता वाले परमाणु संयंत्रों का संचालन आयात पर काफी हद तक निर्भर करता है। वर्ष 2024 में अमेरिका ने अपनी कुल जरूरत का 81 फीसदी संवर्धित यूरेनियम आयात के जरिए पूरा किया, जिसमें से लगभग 20 फीसदी अकेले रूस से हासिल हुआ। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अमेरिका अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस पर उतना ही निर्भर है, जितना वह दूसरे देशों को रूस से दूरी बनाने की नसीहत देता है।
इस घटना को भारत के नजरिए से देखना भी जरूरी है। पूर्व राजनयिकों का मानना है कि पश्चिम एशिया संकट के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में कमी की मौजूदा स्थिति में नई दिल्ली के लिए रूस से तेल आयात में कटौती करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। साथ ही, पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति में कमी के बीच भारत के लिए रूसी तेल पर निर्भरता घटाना आसान नहीं होगा, जब तक कि वैश्विक बाजार में लाखों बैरल तेल की भरपाई का कोई वैकल्पिक स्रोत सामने न आए। वाशिंगटन के लिए भी यह उतना ही जरूरी है कि वह भारत जैसे देशों पर दंडात्मक शुल्क लगाने से पहले वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला पर पड़ने वाले असर का आकलन करे, क्योंकि पश्चिम एशिया के हालात पहले से ही अस्थिर बने हुए हैं।
यही वजह है कि विशेषज्ञ बार-बार संयम बरतने की बात कर रहे हैं। यदि अमेरिका रूसी तेल आयात करने वाले देशों पर प्रस्तावित कानून को पूरी सख्ती से लागू करता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ेगा, जिससे पहले से ही संकटग्रस्त पश्चिम एशिया की स्थिति और बिगड़ सकती है। इसके अलावा अमेरिका में अगले वर्ष होने वाले मध्यावधि चुनावों को देखते हुए भी ट्रंप प्रशासन के लिए तेल कीमतों में अचानक उछाल लाने वाला कोई भी कठोर कदम राजनीतिक रूप से जोखिम भरा साबित हो सकता है। इसी वजह से भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर लगातार अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में है, ताकि पिछले वर्ष जैसी स्थिति दोबारा न बने, जब वाशिंगटन ने प्रस्तावित प्रतिबंध कानून का एक मसौदा तैयार किया था।
भारत ने इस दबाव से निपटने के लिए अपनी कूटनीतिक और व्यापारिक रणनीति में भी लचीलापन दिखाया है। अगस्त 2025 में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने पर भारतीय वस्तुओं पर 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाया था, ठीक वैसे ही जैसे चीन के साथ किया गया था। लेकिन फरवरी 2026 में अमेरिका ने यह अतिरिक्त शुल्क वापस ले लिया। इसी तरह पिछले साल डिजिटल सेवाओं पर लगने वाले शुल्क को लेकर बढ़ते दबाव के बीच भारत सरकार ने छह फीसदी गूगल टैक्स को समाप्त कर दिया था। इन कदमों से स्पष्ट होता है कि भारत रूस से ऊर्जा संबंध बनाए रखते हुए भी अमेरिका के साथ व्यापारिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है, अपने बाजार को खोलकर और अमेरिका के हित में कई वस्तुओं पर शुल्क घटाकर।
कुल मिलाकर यह पूरा प्रकरण अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उस सच्चाई को उजागर करता है, जिसमें नैतिकता और भू-राजनीतिक हित अक्सर एक-दूसरे से टकराते नजर आते हैं। अमेरिका एक ओर रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने के नाम पर दूसरे देशों पर प्रतिबंधों का दबाव बनाता है, तो दूसरी ओर अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए उसी रूस पर निर्भर बना हुआ है। यह दोहरा रवैया केवल अमेरिका की मजबूरी भर नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की जटिलता को भी दर्शाता है, जहां हर देश अपने राष्ट्रीय हित को सिद्धांतों से ऊपर रखता है। भारत जैसे देशों के लिए इससे यह सीख मिलती है कि ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में किसी एक शक्ति के दबाव में आने के बजाय संतुलित, बहुआयामी और आत्मनिर्भर रणनीति अपनाना ही दीर्घकालिक हित में है।
(शिक्षिका)





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