बुनियादी स्तंभ है लोकतंत्र

इलमा अज़ीम 

लोकतंत्र केवल मतपत्र पर लगाई गई मुहर का नाम नहीं है। यह उस विश्वास का नाम है जिसमें प्रत्येक नागरिक को अपनी आवाज, अपनी गरिमा और अपने अधिकारों के साथ राष्ट्र-निर्माण में सहभागी होने का अवसर मिलता है। एक तरह से शांति, स्वतंत्रता, समानता एवं सह-जीवन का बुनियादी स्तंभ है लोकतंत्र। आज दुनिया के सामने लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या लोकतंत्र केवल संस्थागत ढांचे के रूप में जीवित है या उसके भीतर नागरिक स्वतंत्रता, समानता, न्याय, संवाद और मानवीय गरिमा भी सुरक्षित हैं? लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि सत्ता का अंतिम स्रोत जनता होती है। लेकिन इसकी कमजोरी भी यहीं से शुरू होती है। 

जब जनता अपनी जिम्मेदारी भूल जाती है, जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति तो जागरूक रहते हैं लेकिन कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाते हैं, जब चुनाव जाति, धर्म, क्षेत्र, धनबल, बाहुबल या झूठे प्रचार के प्रभाव में आने लगते हैं, तब लोकतंत्र का बाहरी ढांचा तो बचा रहता है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। आज दुनिया के अनेक देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने गंभीर चुनौतियां हैं।  राजनीतिक धू्रवीकरण बढ़ रहा है, संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर दबाव दिखाई देता है तथा सत्ता के केंद्रीकरण की प्रवृत्ति कई समाजों में चिंता का कारण बन रही है। 

लोकतंत्र के नाम पर चुनाव हो जाना पर्याप्त नहीं है। यदि चुनाव के बाद नागरिकों की आवाज को महत्व न मिले, विपक्ष को शत्रु समझा जाए, मीडिया स्वतंत्र न रहे, न्यायपालिका पर दबाव हो और सत्ता जवाबदेही से मुक्त होने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे बहुमत की निरंकुशता में बदल सकता है। महात्मा गांधी का लोकतंत्र संबंधी चिंतन आज भी इस संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। 

गांधी का स्पष्ट विचार था कि लोकतंत्र हिंसा और असत्य के सहारे कायम नहीं रह सकता। लोकतंत्र की दूसरी बड़ी आवश्यकता है संवाद की संस्कृति। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है।  सरकार से प्रश्न पूछना राष्ट्र-विरोध नहीं; विपक्ष की आलोचना लोकतंत्र-विरोध नहीं; मीडिया द्वारा सत्ता से जवाब मांगना व्यवस्था-विरोध नहीं। बल्कि यही लोकतंत्र की जीवंतता के प्रमाण हैं। जब असहमति को दबाया जाता है, तब लोकतंत्र का संवाद समाप्त होता है और उसके स्थान पर भय जन्म लेता है। इसीलिए लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों में भी आंतरिक लोकतंत्र जरूरी है। 

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