दवा की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

राजीव त्यागी 

 दवाओं की कीमतों में निर्माता और अस्पताल के बीच होने वाले भारी अंतर पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने दवा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कुछ दवाओं में प्राइस टू रिटेलर (PTR) और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच अंतर 1,000% तक होने की बात सामने आई है। खासकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं में यह अंतर मरीजों के लिए आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है।

अस्पतालों को ज्यादा मार्जिन वाली दवा रखने का प्रोत्साहन

कई ऐसी दवाएं डॉक्टर के पर्चे के बिना सीधे नहीं खरीदी जा सकतीं। ऐसे में अस्पताल किसी खास ब्रांड की दवा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आरोप है कि कुछ कंपनियां अस्पतालों को कम PTR पर दवा उपलब्ध कराते हुए MRP काफी अधिक निर्धारित करती हैं। इससे अस्पताल को दोनों कीमतों के बीच का अंतर बतौर मार्जिन मिल सकता है।

इस व्यवस्था में मरीज के पास दूसरी जगह से सस्ती समान दवा खरीदने का विकल्प भी सीमित हो जाता है। प्रतियोगिता आयोग की जांच में कुछ निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों को परिसर में मौजूद फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर किए जाने की बात भी सामने आई है।

100 रुपये की दवा का उदाहरण

मौजूदा व्यवस्था को समझने के लिए उदाहरण दिया गया है। यदि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) किसी दवा की औसत बाजार कीमत ₹100 तय करता है तो अधिकतम कीमत ₹116 हो सकती है। लेकिन यदि अस्पताल निर्माता से वही दवा ₹50 में खरीद लेता है, तो वह मरीज से ₹116 तक वसूल सकता है। इस स्थिति में ₹66 का अंतर अस्पताल के पास रह सकता है।

कैंसर की 526 ब्रांडेड दवाओं की कीमतों में भारी कमी

2019 में NPPA ने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के व्यापार मार्जिन को 30% तक सीमित करने का प्रयोग किया था। इसके बाद औषधि विभाग के अनुसार 526 ब्रांड की कीमतों में 91% तक की कमी दर्ज की गई। इससे संकेत मिला कि कई दवाओं के MRP में काफी बड़ा मार्जिन शामिल था।

बढ़ती कीमत के साथ घटे मार्जिन की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने सभी दवाओं पर एक निश्चित प्रतिशत मार्जिन तय करने का सुझाव दिया है। हालांकि संपादकीय के अनुसार महंगी दवाओं पर प्रतिशत मार्जिन कम करने वाली व्यवस्था अधिक प्रभावी हो सकती है। इससे विक्रेताओं को सिर्फ अधिक कीमत वाली दवाएं बेचने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन मिलने की संभावना कम होगी।


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