इलेक्ट्रिक चाक ने बदली कुम्हारों की तकदीर, पांच गुना तक बढ़ी आमदनी
मेरठ के 210 से अधिक कुम्हारों को निशुल्क मिला इलेक्ट्रिक चाक, उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ी; दीपावली के लिए अभी से मिल रहे बड़े ऑर्डर
मेरठ। मिट्टी को आकार देकर घर-घर रोशनी पहुंचाने वाले कुम्हारों के हुनर को अब आधुनिक तकनीक का सहारा मिल गया है। योगी सरकार की ग्रामोद्योग विकास योजना के तहत मेरठ जिले में 210 से अधिक कुम्हारों को निशुल्क इलेक्ट्रिक चाक उपलब्ध कराया गया है। इससे न केवल उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ी है, बल्कि कुम्हार परिवारों की आमदनी में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। कुम्हारों के मुताबिक पारंपरिक चाक की तुलना में इलेक्ट्रिक चाक से पांच से सात गुना तक अधिक उत्पादन हो रहा है।
50-60 से बढ़कर 300-400 दीये
गढ़ रोड निवासी कुम्हार सुरेश बताते हैं कि पहले पारंपरिक चाक से एक घंटे में करीब 50-60 दीये ही तैयार हो पाते थे। इलेक्ट्रिक चाक आने के बाद इसी अवधि में 300-400 तक डिजाइनर दीये तैयार किए जा रहे हैं। उत्पादन बढ़ने से दीपावली के सीजन में बड़े ऑर्डर लेना और समय पर पूरा करना आसान हो गया है।
कुम्हार मनोज कुमार के मुताबिक इस बार दीपावली के लिए उन्हें करीब ढाई लाख दीयों का ऑर्डर मिल चुका है। इलेक्ट्रिक चाक से वह एक घंटे में करीब 700 दीये तक तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि मिट्टी के पारंपरिक दीयों और अन्य उत्पादों के प्रति लोगों का आकर्षण फिर बढ़ रहा है, जिसका सीधा लाभ कुम्हार परिवारों को मिल रहा है।
210 से ज्यादा कुम्हारों को मिला लाभ
माटीकला बोर्ड की ओर से वित्तीय वर्ष 2020-21 में शुरू की गई योजना के तहत अब तक मेरठ जिले में 210 से अधिक कुम्हारों को इलेक्ट्रिक चाक वितरित किए जा चुके हैं। करीब 13 से 15 हजार रुपये कीमत वाला इलेक्ट्रिक चाक पात्र बीपीएल परिवारों के कुम्हारों को निशुल्क दिया जाता है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी 40 लोगों को योजना का लाभ देने का लक्ष्य रखा गया है।
मेहनत कम, उत्पादन ज्यादा
दीपक प्रजापति बताते हैं कि हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक पर लंबे समय तक काम करना काफी थकाऊ होता था। इससे हाथ, कंधे और सीने में दर्द जैसी परेशानियां होती थीं। परिवार के सदस्य भी ज्यादा देर तक काम नहीं कर पाते थे। इलेक्ट्रिक चाक ने इस मुश्किल को काफी हद तक कम कर दिया है। अब परिवार के सदस्य मिलकर 10 से 12 घंटे तक काम कर लेते हैं और बड़े ऑर्डर भी आसानी से पूरे हो जाते हैं।
बिहारी प्रजापति के अनुसार इलेक्ट्रिक चाक ने माटीकला को नई रफ्तार दी है। पहले जहां बड़े ऑर्डर पूरा करना चुनौती होता था, वहीं अब कम समय में अधिक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
हर समाज के पात्र व्यक्ति को मिल सकता है लाभ
जिला ग्रामोद्योग अधिकारी मान्या चतुर्वेदी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मिट्टी के दीयों और बर्तनों की मांग बढ़ी है। सरकारी योजनाओं के जरिए माटीकला से जुड़े परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। अब आम लोग भी प्लास्टिक और अन्य विकल्पों की जगह मिट्टी के दीयों व बर्तनों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
उन्होंने बताया कि योजना का लाभ केवल प्रजापति समाज तक सीमित नहीं है। किसी भी समाज का पात्र इच्छुक व्यक्ति आवेदन कर सकता है। आवेदक का संबंधित जिले का मूल निवासी होना और उम्र 18 से 55 वर्ष के बीच होना जरूरी है। टूल-किट मिलने से पहले मंडलीय प्रशिक्षण केंद्र पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण भी अनिवार्य है।
इसके अलावा परिवार में पहले किसी विभाग या संस्था से माटीकला टूल-किट प्राप्त नहीं हुई होनी चाहिए। आवेदक का माटीकला कारीगर के रूप में पंजीकरण और तहसील स्तर से सत्यापन भी जरूरी है।
नई तकनीक ने बदला पारंपरिक कारोबार
इलेक्ट्रिक चाक ने मेरठ के कुम्हारों के पारंपरिक कारोबार को आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप ढालने में मदद की है। उत्पादन बढ़ने से जहां दीपावली के बड़े ऑर्डर पूरे करना आसान हुआ है, वहीं डिजाइनर दीयों और मिट्टी के दूसरे उत्पादों ने कुम्हारों के लिए कमाई के नए अवसर भी पैदा किए हैं।


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