छप्पन इंच की सामाजिक दादागीरी
- आसिम अनमोल अपना मोहल्ला अपनी दादागीरी बड़ी कमाल की होती है । इसको सामाजिक दादागीरी भी कह सकते हैं। दादागीरी से ही समाज का ख़्याल रखना भी आराम से हो जाता है। दादागीरी के स्तर की बात करें तो बड़े स्तर की दादागीरी अपनी दादागीरी दिखाने से पहले अपना नफ़ा नुक़सान देखकर ही कदम बढ़ाती है। परन्तु मोहल्ले की दादागीरी इतनी बेख़ौफ़ किस्म की होती है कि किसी प्रकार का भय नहीं सताता । दहाड़ने का परिपक्व हौसले का साथ होता है । टुच्ची टाइप की हैसियत कदम कदम पर साथ दे रही होती है। सुरक्षित दरवाज़ा अपना होता है ।
बेरोज़गार कुंठित टाइप रुतबा भी साथ दे रहा होता है । मोहल्ले के चंद मुठ्ठी भर लोग भी बिलकुल अपने से लगते हैं । वही अनाप शनाप जोश भरने के लिए काफी होते हैं। खराब बात को भी अच्छी बात का चोला पहना देते हैं । कितनी सुखद दादागीरी बन जाती है। अब जैसा मन चाहे दबे कुचले समाज पर अर्थहीन दादागीरी दिखाते हुए साइक्लोजिकल प्रेशर डालते रहिए। ताकि सामने वाला सकारात्मक होकर भी गुर्राने का काम कम करे। दबकर जीने में ज्यादा विश्वास करे। मोहल्ले की दादागीरी का एक ख़ास गुण यह भी होता है कि चुप रहना पसंद नहीं करती।
बोलते रहने से अंडोंसियों -पड़ोसियों का ध्यान अपनी ओर खींचने में माहिर रहती है । उसका सोचना है कि चुप रहने में सामने वाला पुश्तैनी दादागीरी अपने नाम न कर ले ? इसी लिए वो तरह तरह की सामाजिक गतिविधियों में अपने आपको मशगूल रखती है। जिससे वो मोहल्ले वालों की निगाह में देवता बनकर रहे। मोहल्ले की दादागीरी में शराफ़त अगर शामिल न हो तो दादागीरी ज्यादा समय तक परवान नहीं चढ़ती। शराफत से दादागीरी निभाने में यह लाभ होता है कि मोहल्ले वालों की नज़रों में आप अच्छे दिनों की तरह अच्छे इंसान बने रहते हैं।
दुनिया की जितनी खुराफात आपके अंदर समाहित होती है वो सब की सब अच्छे इंसान में परिवर्तित हो जाती है। मोहल्ले वाले आपको दूध का धुला समझना आरम्भ कर देते हैं। मोहल्ले की दादागीरी के साथ साथ अगर आप ज़रा सा धार्मिक हो गए तो आपका मामला और चकाचक होता जाता है।आपकी दादागीरी पर कोई संदेह भी नहीं करता। इधर इबादत कीजिए उधर मोहल्ले में कहीं पर भी अपना रौला जमाने के वास्ते सुन्दर सुन्दर गालियों से सभी को सम्बोधित करते रहिए।
सम्बोधन का विषय चाहे कुछ हो। बस सम्बोधन ऐसा कड़क होना चाहिए। जिससे लोगों को दादागीरी का मानसिक दबाव समझ में आने लगे। तभी तो मोहल्ले में रहने का कुछ तो मतलब बनता है। अब भले ही शहर में यह दादागीरी मिटटी में मिल जाए। परन्तु मोहल्ले में यही दादागीरी अपनी पहचान बनाती घूमती है। छप्पन इंच का सीना फुलाए इधर उधर मारी मारी फिरती है। मजाल है कि ऐसी दादागीरी की तरफ नज़र उठाकर कोई देख ले। यह हक़ मोहल्ले की दादागीरी को ही हासिल है।






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