जंग लगी चाबी


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'  
कसबे के सौ साल पुराने डाकघर की सीलन भरी दीवार पर लोहे की एक बड़ी सी जंग लगी चाबी वैसे ही लटकी रहती थी, जैसे सरकारी दफ्तरों की फाइलों पर ईमानदारी लटकी रहती है। लाल ईंटों की उधड़ती सफेदी के बीच वह चाबी उस पूरे इलाके के लिए कौतूहल का केंद्र थी, क्योंकि इस मुल्क में लोग ठोस रोटी से ज्यादा रहस्यमयी भूख पर यकीन करते हैं।

गाँव का हर इंसान जब भी रजिस्ट्री कराने आता, तो उस चाबी को ऐसे देखता मानो वह कोई चाबी नहीं, बल्कि सीधे स्वर्ग जाने का शॉर्टकट हो। डाकघर के बाहर नीम के पेड़ की छाँव में बदरी काका सुबह नौ बजे ही अपनी ड्यूटी संभाल लेते थे, जैसे भ्रष्टाचार अपनी कुर्सी संभालता है। सफेद खद्दर पहने वे उस चाबी को ऐसे निहारते, जैसे कोई नेता चुनाव जीतने के बाद अपनी कुर्सी को देखता है। नए डाकिया साहब उन्हें देखकर चकित होते, पर काका अपनी डायरी में कुछ न कुछ दर्ज करते रहते थे, शायद उन वादों की लिस्ट जो कभी पूरे नहीं होने थे। गाँव के नौजवान पूछते, "काका, इससे कौन सा खजाना खुलेगा?" तो काका वैसी ही रहस्यमयी मुस्कान बिखेर देते जैसी वित्त मंत्री बजट पेश करने से पहले बिखेरते हैं और कहते, "बेटा, इसमें गाँव की सांसें बंद हैं।" असल में भारत में उम्मीद वह गाजर है, जिसे गधा जिंदगी भर पकड़ने की कोशिश में दौड़ता रहता है।

डाकघर के नए पोस्टमास्टर सत्यप्रकाश जी नियम-कानून के उतने ही पक्के थे, जितना कि एक बेईमान आदमी अपनी कमीशन के लिए होता है। उन्हें बदरी काका का यह रोज का ड्रामा वैसे ही अखरता था, जैसे किसी ईमानदार को सच। एक दिन उन्होंने कड़क कर पूछा, "काका, यहाँ क्यों भीड़ लगाते हो? अगर पेंशन का मामला है तो बताओ, वरना सरकारी काम में बाधा मत डालो।" सरकारी काम में बाधा डालना इस देश में सबसे बड़ा पाप है, भले ही वह काम खुद किसी बाधा से कम न हो। बदरी काका कांपती आवाज में बोले, "साहब, मैं तो अपनी अमानत की हिफाजत कर रहा हूँ।" सत्यप्रकाश जी चिढ़कर बोले, "इस सड़ी-गली चाबी को अमानत कह रहे हैं? इसे तो कूड़ेदान में होना चाहिए।" सत्यप्रकाश जी को क्या पता था कि इस देश में सड़ी-गली परंपराएं ही सबसे बड़ी अमानत मानी जाती हैं।

जैसे ही सत्यप्रकाश जी ने चाबी को कूड़ा कहा, बदरी काका के चेहरे पर वैसी ही तड़प आई जैसी किसी भक्त के सामने भगवान को गाली देने पर आती है। पास ही बैठे रहमान मियाँ भी कूद पड़े। भारत में जब भी कोई तर्क की बात करता है, तो दो-चार लोग भावनाओं का झंडा लेकर तुरंत पहुँच जाते हैं। रहमान बोले, "साहब, इस चाबी का नाता गाँव की धरोहर से है। शहर गए जमींदार ने बच्चों के लिए तिजोरी बनवाई थी।" सत्यप्रकाश जी हँसे, "सरकारी डाकघर में व्यक्तिगत तिजोरी? यहाँ तो सरकारी पेन भी धागे से बँधा रहता है ताकि कोई उसे चुरा न ले।" पर काका ने डायरी के नंबर दिखाए। अब सत्यप्रकाश जी के मन में जिज्ञासा और शक का ऐसा युद्ध छिड़ा, जैसा किसी मध्यमवर्गीय आदमी के मन में सेल देखकर छिड़ता है। उन्हें लगा शायद विभाग को बिना बताए यहाँ कोई काला धन दबा है, जिसे गाँव वाले हड़पना चाहते हैं। उन्होंने चपरासी को हुक्म दिया, "रामू, टॉर्च लाओ! आज इस राष्ट्रव्यापी रहस्य का पोस्टमार्टम होकर रहेगा।"

बदरी काका गिड़गिड़ाने लगे, "साहब, मत खोलिए! बरसों का भ्रम टूट जाएगा।" पर सत्यप्रकाश जी कब रुकने वाले थे? वे 'सत्य' की खोज में वैसे ही अंधे थे जैसे कोई न्यूज एंकर सनसनी की खोज में होता है। गाँव वाले जमा हो गए, जैसे एक्सीडेंट देखने के लिए भीड़ जुटती है। स्टोर रूम की जंग लगी कुंडी खुली, तो अंदर धूल और जालों के बीच एक विशाल लोहे का बॉक्स मिला। सत्यप्रकाश जी ने गर्व के साथ वह चाबी घुमाई। ताला 'कट' से खुल गया, मानो वह भी इस पाखंड का हिस्सा बनकर थक चुका था। सबने गर्दनें लंबी कीं, जैसे कोई मुफ्त की रेवड़ी बंटने वाली हो। ढक्कन उठा, तो अंदर से सोना-चाँदी नहीं, बल्कि केवल धूल और कुछ खाली लिफाफे निकले।

सत्यप्रकाश जी ने एक मुड़ा हुआ कागज निकाला और उसे पढ़ने लगे। वह जमींदार के बेटे का पैगाम था, जो तीस साल पहले शहर जाकर गायब हो गया था। खत में लिखा था—"मेरे प्यारे गाँव वालों, मेरा झूठ पकड़ा जा चुका है। पिताजी ने जो पैसे विकास के लिए दिए थे, वे मैंने शहर की चकाचौंध में जुए और शराब में स्वाहा कर दिए।" सत्यप्रकाश जी की आवाज ऐसी धीमी हुई, जैसे हारने के बाद किसी प्रत्याशी की होती है। खत में आगे लिखा था कि जब मैं कंगाल हो गया, तो गाँव को मुँह दिखाने की हिम्मत नहीं थी, इसलिए मैंने यह चाबी टँगवा दी ताकि तुम लोग एक 'खूबसूरत झूठ' के सहारे जीते रहो।

सत्यप्रकाश जी ने देखा, बदरी काका बिलख रहे थे। काका बोले, "साहब, मैं ही वह अभागा बेटा हूँ। मेरे पास देने को कुछ नहीं था, इसलिए मैंने उम्मीद की यह चाबी दे दी।" बदरी काका ने वह डायरी थमा दी, जिसमें वे रोज उन भूखे बच्चों के नाम लिखते थे जिन्हें वे कभी कुछ नहीं दे पाए। सत्यप्रकाश जी सुन्न रह गए। पूरा गाँव अपनी ही उम्मीदों के मलबे पर रो रहा था। असल में इस देश का सबसे बड़ा खजाना 'झूठी उम्मीद' ही है, जिसे अगर कोई खोल दे, तो भीतर से सिर्फ धूल और पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं निकलता। चाबी तो घूम गई, पर विकास के बजाय सिर्फ हकीकत का नंगापन बाहर आ गया।

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