रामराज कॉटन ने ‘पंचा’ के जरिए ओडिशा की संथाली बुनाई को दिया नया रूप
मयूरभंज की पारंपरिक बुनाई से तैयार आधुनिक धोती, आदिवासी महिला बुनकरों को नई पहचान और आजीविका का अवसर देने की पहल
मेरठ, 7 अगस्त। रामराज कॉटन ने ओडिशा के मयूरभंज की पारंपरिक संथाली बुनाई को आधुनिक धोती के रूप में प्रस्तुत करते हुए ‘पंचा’ नाम से नई हैंडलूम पेशकश लॉन्च की है। कंपनी का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य देश की कम-ज्ञात बुनाई परंपराओं को व्यापक पहचान दिलाने के साथ इस शिल्प को पीढ़ियों से संजोकर रखने वाली आदिवासी महिला बुनकरों के लिए नए आजीविका अवसर तैयार करना है।
रामराज कॉटन के संस्थापक एवं चेयरमैन के. आर. नागराजन ने कहा कि भारत की हैंडलूम विरासत बेहद विविध है, लेकिन कई पारंपरिक बुनाई शैलियां आज भी सीमित समुदायों तक ही सिमटी हुई हैं। मयूरभंज की संथाली बुनाई भी ऐसी ही अनमोल विरासत है। ‘पंचा’ के जरिए कंपनी ने इस पारंपरिक बुनाई को धोती के नए स्वरूप में प्रस्तुत किया है, ताकि इसकी मौलिकता बरकरार रखते हुए इसे व्यापक स्तर पर पहचान मिल सके।
उन्होंने कहा कि इस पहल से न केवल पारंपरिक शिल्प के लिए नए बाजार अवसर तैयार होंगे, बल्कि इससे जुड़ी कला और सांस्कृतिक पहचान को भी संरक्षित करने में मदद मिलेगी। साथ ही, उन महिला बुनकरों की आजीविका को मजबूती मिलने की उम्मीद है, जिन्होंने इस परंपरा को आज तक जीवित रखा है।
बदलते दौर में पहचान खो रही थी बुनाई
संथाली आदिवासी समुदाय की महिलाएं पारंपरिक रूप से इस विशिष्ट बुनाई तकनीक से साड़ियां तैयार करती रही हैं। हालांकि संरक्षण की कमी, बदलती जीवनशैली और सीमित बाजार अवसरों के चलते पिछले कई दशकों में यह बुनाई धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती गई।
रामराज कॉटन ने इसकी कलात्मक विशेषताओं और आधुनिक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए संथाली बुनाई को धोती के रूप में नया स्वरूप दिया है। कंपनी के अनुसार, ‘पंचा’ पारंपरिक बुनाई की मूल विशेषताओं को बनाए रखते हुए इसे एक नई और व्यापक पहचान प्रदान करता है।
100 प्रतिशत कॉटन और हाथ से तैयार
‘पंचा’ का प्रत्येक उत्पाद 100 प्रतिशत कॉटन कपड़े से हाथ से बुना जाता है। इसमें ऑफ-व्हाइट बेस, एजो-फ्री कलर, साधारण बुनाई और एक्स्ट्रा-वेफ्ट तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
कंपनी के मुताबिक, इन विशेषताओं के जरिए उत्पाद में पारंपरिक शिल्प की सादगी और विशिष्टता को बनाए रखा गया है। यह पहल उन बुनकरों की उत्कृष्ट शिल्पकला को भी सामने लाती है, जो पीढ़ियों से चली आ रही संथाली बुनाई परंपरा को आज भी आगे बढ़ा रही हैं।


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