आजकल’ सिर्फ मैगज़ीन नहीं, उर्दू साहित्य की एक संस्था है: वक्ता

CCSU के उर्दू विभाग में ‘आजकल मैगज़ीन की लिटरेरी सर्विसेज’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम, देशभर के साहित्यकारों ने साझा किए विचार

मेरठ, 6 अगस्त। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU) के उर्दू विभाग और इंटरनेशनल उर्दू स्कॉलर्स एसोसिएशन (IUSA) के संयुक्त तत्वावधान में ‘अदबनुमा’ के तहत ‘मैगज़ीन आजकल की लिटरेरी सर्विसेज’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में उर्दू साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े देश के विभिन्न हिस्सों के विद्वानों, लेखकों और संपादकों ने ‘आजकल’ पत्रिका के साहित्यिक योगदान, संपादकीय परंपरा और बदलते दौर में उसकी प्रासंगिकता पर चर्चा की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर सगीर इफ्राहीम ने कहा कि ‘आजकल’ में प्रकाशित होने वाला हर आलेख उच्च गुणवत्ता का होता है। उन्होंने कहा कि अबरार रहमानी और उनके सहयोगियों ने पत्रिका के लिए जिस लगन से काम किया, वह काबिल-ए-तारीफ है। लेख जुटाना और लगातार मेहनत करना आसान काम नहीं है। उन्होंने पत्रिका की घटती मांग को चिंता का विषय बताते हुए कहा कि इतनी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका की लोकप्रियता कम होना अफसोस की बात है।

कार्यक्रम की शुरुआत मोहम्मद नदीम ने पवित्र कुरान की तिलावत से की। कार्यक्रम में दिल्ली के ‘आजकल’ के पूर्व संपादक डॉ. अबरार रहमानी, वर्तमान संपादक अब्दुल मन्नान, मशहूर कहानीकार डॉ. निगार अजीम, पूर्व संपादक हसन जिया, ‘आजकल’ नई दिल्ली की नरगिस सुल्ताना तथा IUSA की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन वक्ता के रूप में शामिल हुईं। डॉ. इरशाद सियानवी ने विषय का परिचय दिया, जबकि प्रसिद्ध शायर और आलोचक डॉ. शफी अय्यूब ने संचालन किया।

‘आजकल’ अपनी गुणवत्ता के लिए जानी जाती है

डॉ. इरशाद सियानवी ने कहा कि ‘आजकल’ अपनी गुणवत्ता के कारण पूरी उर्दू दुनिया में जानी और पढ़ी जाती है। उर्दू भाषा एवं साहित्य के साथ विज्ञान और कला की समझ रखने वाले संपादकों ने बदलते समय और समकालीन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए पत्रिका को नई दिशा दी। स्थापना से लेकर अब तक ‘आजकल’ कई दौर से गुजरी है और अलग-अलग विद्वान संपादकों के मार्गदर्शन में इसकी साहित्यिक गतिविधियां जारी रही हैं।

उर्दू विभाग के प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि ‘आजकल’ ने अपनी गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया। पहले बड़े आकार में प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका अब छोटे फॉर्मेट में भी अपनी साहित्यिक भूमिका प्रभावी ढंग से निभा रही है। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल सभी संपादकों और अतिथियों का स्वागत किया।

डॉ. अब्दुल हई ने कहा कि ‘आजकल’ ने न केवल पाठकों और साहित्य प्रेमियों के बीच अपनी अहमियत साबित की, बल्कि उनके दिलों में भी अपनी जगह बनाई। उन्होंने पत्रिका के विभिन्न विशेषांकों का उल्लेख करते हुए कहा कि गौतम बुद्ध, जमात, संगीत, डॉ. हुसैन और गुरु नानक जैसे विषयों पर केंद्रित अंक उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान हैं।

‘आजकल’ से सीखा पढ़ना, लिखना और संस्कृति

नरगिस सुल्ताना ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब उन्होंने उर्दू टाइपिस्ट के तौर पर ‘आजकल’ में काम शुरू किया था, तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि उन्हें इतने बड़े साहित्यकारों के साथ काम करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने बताया कि पत्रिका में काम करते हुए उन्हें पढ़ने, अनुवाद करने और लिखने का प्रशिक्षण मिला। उनके अनुसार, साहित्य के कार्यालय में काम करना और साहित्य एवं संस्कृति की सेवा करना अलग-अलग बातें हैं।

मशहूर कहानीकार डॉ. निगार अजीम ने कहा कि ‘आजकल’ उनके लिए सिर्फ एक पत्रिका नहीं, बल्कि ऐसी संस्था है, जहां से उन्होंने पढ़ना, लिखना और संस्कृति को समझना सीखा। उन्होंने राजनारायण के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके संपादन के दौर में साहित्यिक गुणवत्ता और मानवीय संवेदनाओं को विशेष महत्व दिया गया। उन्होंने कहा कि ‘आजकल’ से कई लेखकों को सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिला।

‘पचास साल से आजकल से जुड़ा हूं’

पूर्व संपादक हसन जिया ने कहा कि वह करीब 50 वर्षों से ‘आजकल’ से जुड़े हैं और पाठक के तौर पर आज भी उनका रिश्ता कायम है। उन्होंने कहा कि जोश और अर्श मलसियानी जैसे साहित्यकारों ने पत्रिका को विशिष्ट पहचान दिलाई। उनके अनुसार, पहले लोगों में साहित्य के प्रति वास्तविक रुचि थी, जबकि आज साहित्य पढ़ने के पीछे व्यावसायिक या अन्य उद्देश्य भी जुड़ गए हैं।

उन्होंने कहा कि सरकारी पत्रिका होने के बावजूद ‘आजकल’ ने अपनी गुणवत्ता बरकरार रखी और किसी दबाव के आगे नहीं झुकी। उन्होंने उम्मीद जताई कि आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से पत्रिका बदलते दौर में भी अपनी भूमिका निभाती रहेगी।

डॉ. जमील अख्तर ने कहा कि ‘आजकल’ उन चुनिंदा उर्दू पत्रिकाओं में है, जिसका इतना लंबा साहित्यिक सफर रहा है। उन्होंने पत्रिका के विभिन्न विशेषांकों का उल्लेख करते हुए कहा कि गालिब, संगीत, जाकिर हुसैन और गुरु नानक जैसे विषयों पर प्रकाशित अंक इसके शोधपरक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि आकार और पृष्ठों में कमी के बावजूद पत्रिका आज भी विविध विषयों को सामने ला रही है।

‘आधुनिक तकनीक से आजकल को आकर्षक बनाने की कोशिश’

‘आजकल’ के संपादक अब्दुल मन्नान ने बताया कि पत्रिका के अनगिनत अंक प्रकाशित हो चुके हैं। विशेषांकों की परंपरा में बदलाव करते हुए अब विभिन्न विषयों पर ‘कोने’ निकालने की प्रक्रिया शुरू की गई है। उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे शोध कार्यों को ‘आजकल’ के माध्यम से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से पत्रिका को अधिक आकर्षक और पाठकों के लिए उपयोगी बनाने की कोशिश पिछले कई महीनों से जारी है। उन्होंने कहा कि आधिकारिक पत्रिका होने के कारण कुछ व्यावहारिक चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन ‘आजकल’ का प्रकाशन जारी रहेगा।

पूर्व संपादक डॉ. अबरार रहमानी ने कहा कि ‘आजकल’ अन्य पत्रिकाओं से अलग है। उन्होंने अपने संपादकीय कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने साहित्य और भाषा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मौलिक लेख प्रकाशित किए। कठिन परिस्थितियों के बावजूद पत्रिका की साहित्यिक यात्रा को जारी रखने का प्रयास किया गया।

IUSA की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि उन्होंने छात्र जीवन से ही ‘आजकल’ पढ़ना शुरू कर दिया था। उनके अनुसार, यह ऐसी पत्रिका है जो लेखकों को नई राह दिखाती है। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल विद्वानों और साहित्यकारों को एक परिवार का हिस्सा बताते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से नई पीढ़ी के साहित्यकारों और शोधार्थियों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

कार्यक्रम में सलमान अब्दुल समद, मोहम्मद शमशाद सहित अन्य लोग भी जुड़े रहे।

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