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मानव और ऊर्जा विकास
इलमा अज़ीम
मानव सभ्यता का विकास ऊर्जा के निरंतर और विश्वसनीय उपयोग पर आधारित रहा है। उद्योगों की मशीनें हों, घरों में रोशनी, अस्पतालों की जीवनरक्षक प्रणालियां, रेल और मैट्रो का संचालन अथवा अंतरिक्ष अभियानों की सफलता, हर क्षेत्र के पीछे ऊर्जा रूपांतरण का विज्ञान कार्य करता है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और कार्बन उत्सर्जन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब थर्मल इंजीनियरिंग केवल कोयला आधारित बिजलीघरों तक सीमित विषय नहीं रह गई है।
यह ऊर्जा दक्षता, स्वच्छ प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), कार्बन कैप्चर, अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति (वेस्ट हीट रिकवरी), हरित हाइड्रोजन और हाइब्रिड ऊर्जा प्रणालियों जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का आधार बन चुकी है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार जून 2026 तक देश की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता लगभग 548 गीगावॉट पहुंच चुकी है। इसमें 54 प्रतिशत से अधिक क्षमता गैर-जीवाश्म (नॉन-फॉसिल) स्रोतों (सौर, पवन, जलविद्युत तथा परमाणु ऊर्जा) से आती है, जो भारत की ऊर्जा यात्रा का ऐतिहासिक पड़ाव है। भारत ने 2025 में ही अपनी स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया था और अब यह अनुपात 54 प्रतिशत को पार कर लगातार बढ़ रहा है।
हालांकि स्थापित क्षमता और वास्तविक बिजली उत्पादन में अभी भी बड़ा अंतर है। देश में कुल बिजली उत्पादन का अधिकांश हिस्सा आज भी कोयला आधारित तापीय विद्युत संयंत्रों से ही आता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर हैं, जबकि थर्मल पावर संयंत्र चौबीसों घंटे स्थिर बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम हैं।
यही कारण है कि ऊर्जा संक्रमण के इस दौर में भी भारत के लिए थर्मल इंजीनियरिंग की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि इसकी प्रकृति बदल रही है। कोयला आधारित तापीय संयंत्रों ने दशकों तक भारत की औद्योगिक और आर्थिक प्रगति को ऊर्जा प्रदान की है, लेकिन इनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी गंभीर हैं। यही कारण है कि अब तापीय ऊर्जा उत्पादन को अधिक स्वच्छ, अधिक दक्ष और कम प्रदूषणकारी बनाने की दिशा में तकनीकी नवाचारों पर विशेष बल दिया जा रहा है।





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