रक्षाबंधन
- नीलमणि
रक्षाबंधन पर गुप्ता जी बहन के घर पहुँचे। भोजन के बाद संगीत की महफ़िल जम गई।उन्होंने अपनी नई ग़ज़लें सुनाईं। खूब वाह-वाह हुई। तभी छोटी बहन बबली मुस्कराकर बोली, "भैया, ग़ज़लें बहुत सुंदर हैं... पर उन्हें भी तो सुनाओ, जो तुम्हारी गजलों की असली प्रेरणा हैं।"
"अरे, बबली तेरी भाभी को फुर्सत ही कहां है!" गुप्ता जी हंसकर बोले।
बबली की मुस्कान गंभीर हो गई।
"फुर्सत मिले भी तो कैसे? छोटे बच्चे, घर, बाहर के काम, रिश्तेदारियाँ... सब भाभी संभालती हैं और तुम? बैंक, टीवी और ग़ज़ल। कभी उनके हिस्से का थोड़ा-सा जीवन भी जीकर देखो, शायद तुम्हारी ग़ज़लों में और भी सच्चाई उतर आए।"
पहली बार महफ़िल में सन्नाटा छा गया।
घर लौटते ही गुप्ता जी ने कहा, "रीना, आज से बैंक, बाजार, बिल और बाहर के सारे काम मैं देखूंगा, तुम घर और बच्चे देखो। "
रीना ने उनकी ओर देखा पर विश्वास नहीं कर पाई।
- लेखिका व कार्टूनिस्ट, सी- 27, राधा गार्डेन मवाना रोड, मेरठ।



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