टिफिन का डिब्बा


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'


विकास खंड शिक्षा अधिकारी के दफ़्तर के बाहर लगे पुराने नीम के पेड़ की कड़वी छांव में बहत्तर साल के देवकीनंदन बाबा रोज़ दोपहर ठीक एक बजे आकर बैठ जाते थे। उनके हाथ में अल्युमिनियम का एक पुराना जंग लगा गोल टिफिन होता था जिसके ढक्कन पर एक उभरा हुआ छोटा सा फूल बना था। दफ़्तर का चपरासी जब भी अपने हाथ में फ़ाइलों का बंडल लिए बाहर निकलता तो बाबा को उस बंद टिफिन को अपनी दोनों हथेलियों में छिपाकर सहलाते देखकर ठहाका लगाता था।

चपरासी ने एक दिन हँसते हुए पूछा कि "बाबा जब रोज़ खाली पेट यहाँ आकर बैठते हो तो इस जंग लगे डिब्बे में अफ़सर के लिए गरम हलवा लाए हो या घर से अपनी भुनी हुई रोटी लेकर आते हो।" देवकीनंदन बाबा ने अपनी सूजी हुई धुंधली आँखों से दफ़्तर की सीढ़ियों की तरफ देखा और बहुत शांत होकर बोले कि "बेटा इस डिब्बे में न तो कोई हलवा है और न ही रोटी बल्कि इसमें मेरे नौनिहाल के सुनहरे भविष्य की वो मिठास बंद है जिसे तुम्हारे साहब का लाल फीता रोज़ कड़वा कर देता है।" दफ़्तर में आने वाले तमाम शिक्षक और मुंशी उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहते कि "लगता है मासाब की तरह यह बूढ़ा भी वज़ीफ़े की फ़ाइल पास कराने का नया नाटक रच रहा है।"

देवकीनंदन बाबा की यह अजीब दिनचर्या पिछले दो सालों से बिना किसी रुकावट के लगातार चल रही थी चाहे जेठ की तपती धूप हो या पोस की कड़कड़ाती ठंड। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी अपनी फ़ाइलें समेटकर बाहर निकलता तो बाबा उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो जाते और कहते कि "बाबू जी क्या आज उस लाल कागज़ पर साहब की मुहर लग गई।" बाबू अपने चश्मे को पोंछते हुए चिढ़कर कहता कि "अरे बाबा जब तक बजट ऊपर से स्वीकृत होकर नहीं आएगा तब तक फ़ाइल एक इंच आगे नहीं सरकेगी और तुम इस जंग लगे डिब्बे को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।" बाबा बिना कोई विरोध दर्ज कराए उस टिफिन को अपने सूती अंगोछे में सहेजते और गाँव की कच्ची पगडंडी पर चुपचाप पैदल ही निकल पड़ते थे। गाँव के लोग आपस में तरह-तरह की चर्चाएँ करते थे कि आखिर एक पुराने बंद टिफिन और शिक्षा विभाग की फ़ाइलों के बीच ऐसा कौन सा गहरा राज़ छुपा है जिसकी खातिर एक बुजुर्ग रोज़ अपनी कांपती टांगों के सहारे तीन किलोमीटर का पैदल सफ़र तय करके उस सरकारी चौखट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता था।

एक दिन अचानक ज़िले के नए मुख्य विकास अधिकारी दफ़्तर के कामकाज का वार्षिक जायज़ा लेने के लिए औचक निरीक्षण करने पहुँच गए। दफ़्तर में हड़कंप मच गया और कर्मचारी अपनी कमियों को छिपाने के लिए फ़ाइलों को अलमारियों में दबाने लगे। निरीक्षण के बाद जब साहब पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र नीम के पेड़ के नीचे बैठे देवकीनंदन बाबा पर पड़ी जिनके हाथों में वही जंग लगा टिफिन दबा हुआ था। साहब ने अपनी सहृदयता का प्रदर्शन करने के लिए मीडिया के कैमरों को आगे किया और बाबा के करीब जाकर बड़े प्यार से पूछा कि "बाबा आप इस तेज़ धूप में यह टिफिन लेकर क्यों खड़े हैं क्या आपको छात्रवृत्ति या पेंशन नहीं मिल रही है बताइए मैं अभी आपकी समस्या का समाधान करवाता हूँ।" देवकीनंदन बाबा ने अपनी आँखों के आंसुओं को रोकते हुए कहा कि "साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो पहले अपनी पाक हथेलियों से इस टिफिन का ढक्कन खोलकर इसके अंदर का सच देख लीजिए।"

साहब ने बड़े कौतूहल से उस जंग लगे अल्युमिनियम के टिफिन का ढक्कन हटाया तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि उसके अंदर कोई खाना या दस्तावेज़ नहीं था बल्कि ईंट भट्ठे की लाल सूखी मिट्टी के ढेले और तीन साल पुराना राज्य स्तरीय मेधावी छात्रवृत्ति का प्रमाणपत्र मुड़ा-तुड़ा रखा था।

देवकीनंदन बाबा की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली और वे रूंधे गले से बोले कि "साहब तीन साल पहले जब मेरे दस साल के अनाथ पोते ने पूरे ज़िले में पहला स्थान पाया था तब अफ़सरों ने उसकी छात्रवृत्ति रोक दी और रिश्वत मांगे बिना चेक देने से साफ़ मना कर दिया। मेरा पोता पढ़ाई छोड़कर आज ईंट भट्ठे पर गारा ढोने के लिए मजबूर हो गया ताकि हम दो वक्त का अनाज जुटा सकें। यह ईंट की मिट्टी उसी भट्ठे की है जहाँ आज एक होनहार बच्चा कलम की जगह पाथने वाली ईंटें पकड़ रहा है। मैं रोज़ यह टिफिन यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपकी व्यवस्था को बता सकूँ कि आपने एक मेधावी बच्चे के भोजन की थाली में ईंट की मिट्टी परोस दी है।" यह सुनते ही साहब के हाथ से टिफिन गिर गया और पूरे दफ़्तर में ऐसा सन्नाटा छा गया जिसने वहाँ खड़े हर इंसान को झकझोर दिया।

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