समझौते में घुटती बेटियां

 इलमा अज़ीम 

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में निर्णय देते हुए कहा दहेज उत्पीड़न की लगातार शिकायतों के बावजूद किसी विवाहित महिला को ‘समझौता करने’, ‘समायोजन करने’ अथवा ‘विवाह बचाने’ की सलाह देना कई बार उत्पीड़कों का मनोबल बढ़ा देती है और उसके परिणाम दुखद तथा घातक हो सकते हैं। 

न्यायालय ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि ‘परिवार का नैतिक और सामाजिक दायित्व है कि वह बेटी की बात पर विश्वास करे, उसका साथ दे तथा उसकी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए।’ वस्तुतः न्यायालय की ये टिप्पणियां केवल एक आपराधिक वाद के निस्तारण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज की उस गहरी सामाजिक मानसिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं, जहां अनेक बार बेटी को अपनी पीड़ा, अपमान और प्रताड़ना की अवहेलना करने और हर स्थिति में विवाह बनाए रखने के लिए विवश किया जाता है। 

यक्ष प्रश्न यह है कि भारतीय समाज में ऐसी सामाजिक मानसिकता का निर्माण आखिर हुआ कैसे, जहां किसी विवाहित बेटी द्वारा बार-बार सहायता की गुहार लगाने के बाद भी उसे सबसे पहले ‘समझौता’ करने की सलाह दी जाती है? यदि अधिकांश मामलों में पीड़िता अपनी व्यथा पहले ही अपने परिवार के समक्ष व्यक्त कर चुकी होती है, तो फिर प्रत्येक त्रासदी के बाद यह प्रश्न क्यों उठता है कि उसने शिकायत क्यों नहीं की? वास्तविकता यह है कि अनेक बार उसकी पीड़ा को गंभीरता से लेने के बजाय सामान्य वैवाहिक विवाद मानकर टाल दिया जाता है। 

वस्तुतः समस्या कानून के अभाव की नहीं, बल्कि उस सामाजिक संस्कृति की है, जिसने वर्षों से ‘समझौता कर लो’ को सामाजिक मानक बना दिया है। निश्चित रूप से कोई भी वैवाहिक जीवन समझौते, पारस्परिक सहयोग और संवेदनशीलता के बिना नहीं चल सकता।

 परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज समझौते और अत्याचार के बीच स्पष्ट सीमा-रेखा निर्धारित करना सीखे। यदि किसी स्त्री को निरंतर अपमानित किया जा रहा हो, उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई जा रही हो, मानसिक अथवा शारीरिक प्रताड़ना दी जा रही हो और ‘भय’ और ‘प्रताड़ना’ उसके दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका हो, तो उसे समझौता नहीं, बल्कि अत्याचार कहा जाएगा। दुर्भाग्यवश, हमारे समाज ने ‘समझौता’ शब्द की परिधि इतनी व्यापक कर दी है कि अनेक बार हिंसा और उत्पीड़न भी उसी के भीतर समाहित कर दिए जाते हैं। निस्संदेह विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है, परंतु किसी भी सामाजिक संस्था का मूल्य किसी व्यक्ति के जीवन, सुरक्षा और गरिमा से अधिक नहीं हो सकता। 

दुर्भाग्यवश, आज भी अनेक परिवार अपनी बेटियों के ‘सफल वैवाहिक जीवन’ को एक ऐसी सामाजिक उपलब्धि के रूप में देखते हैं, जिसे हर परिस्थिति में बनाए रखना आवश्यक समझा जाता है। यही कारण है कि अनेक बार बेटी की सुरक्षा से अधिक विवाह की निरंतरता चिंता का विषय बन जाती है।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts