संवाद ही है समाधान


इलमा अज़ीम 

लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, किंतु असहमति को अराजकता में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति नहीं है। आज संसद संवाद और सहमति का मंच बनने के बजाय टकराव, आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी और  राजनीतिक हठधर्मिता का अखाड़ा बनती जा रही है। 

मानसून सत्र में जिस प्रकार लगातार गतिरोध बना हुआ है, उससे केवल संसदीय कार्यवाही ही बाधित नहीं हो रही, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी आहत हो रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। विपक्ष अपने विरोध को रचनात्मक बनाए, सरकार अपने संवाद को व्यापक बनाए और दोनों मिलकर संसद की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करें। लोकतंत्र का भविष्य टकराव में नहीं, संवाद में सुरक्षित है। संसद की गरिमा नारेबाजी से नहीं, विचार-विमर्श से बढ़ती है। 

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यदि संसद ही गतिरोध का प्रतीक बन जाएगी तो जनता का विश्वास कमजोर होगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। समय की पुकार है कि राजनीति चुनावों की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रनिर्माण की दिशा में आगे बढ़े। पक्ष और विपक्ष दोनों यह स्मरण रखें कि वे किसी दल के नहीं, पहले भारत के प्रतिनिधि हैं। संसद की प्रत्येक घड़ी राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है।

 उसे हठ, अहंकार और राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ाना भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। यदि लोकतंत्र को सशक्त बनाना है, संसद की प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित करनी है और भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो केवल एक ही मार्ग है-संवाद, सहमति और राष्ट्रहित। यही भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही संसदीय मर्यादा का सर्वोच्च आदर्श।

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