बिखरते रिश्ते और समाज
राजीव त्यागी
परिवार केवल एक छत के नीचे रहने वाले लोगों का समूह नहीं, बल्कि विश्वास, त्याग, धैर्य और संस्कारों का जीवंत विद्यालय है। जब इस विद्यालय की नींव कमजोर होने लगती है तो उसका प्रभाव केवल एक घर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज उसकी कीमत चुकाता है। संयुक्त परिवार लोगों को धैर्य, संयम, सहनशीलता और समायोजन सिखाते थे, वहीं आज एकल परिवारों में अवसाद, असहिष्णुता और संबंधों का विघटन बढ़ रहा है, वह हमारे समय का कटु सत्य है।
समय आ गया है कि परिवारों में पुनः संवाद की संस्कृति विकसित की जाए। सप्ताह में कुछ समय ऐसा हो जब पूरा परिवार बिना मोबाइल के साथ बैठे। बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा ही नहीं, अच्छे संस्कार भी मिलें। विद्यालयों में जीवन-मूल्य और भावनात्मक शिक्षा को महत्व दिया जाए। विवाह-पूर्व परामर्श, पारिवारिक परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि परिवार में बुजुर्गों की भूमिका को पुनः सम्मानपूर्वक स्थापित किया जाए, क्योंकि वे केवल अतीत के प्रतीक नहीं, बल्कि भविष्य के मार्गदर्शक हैं। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी किसी न्यायिक टिप्पणी भर नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी का शंखनाद है। यदि हमने अभी भी अपने परिवारों को बचाने का प्रयास नहीं किया तो आने वाले वर्षों में केवल अदालतों में मुकदमे नहीं बढ़ेंगे, बल्कि समाज की संवेदनाएं भी समाप्त होती जाएंगी। आज हम देखें तो माता-पिता और संतान, भाई-बहन, दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच भी भावनात्मक दूरी लगातार बढ़ रही है, यह परिवार परम्परा एवं रिश्तों में बढ़़ती दूरी अब पति-पत्नी के बीच भी बड़ी दरारें डालने लगी है।
रिश्तों का खोखलापन इतना बढ़ गया है कि अपनी ही पत्नी या पति की हत्या करने में भी तनिक संकोच नहीं रहा। ऐसे घटनाएं बार-बार देखने को मिल रही है। घर बड़े हो गए हैं, लेकिन दिल छोटे होते जा रहे हैं। सुविधाएं बढ़ी हैं, परंतु संवेदनाएं सिकुड़ती जा रही हैं। संवाद कम हो गए हैं और स्क्रीन का समय बढ़ गया है। परिणामस्वरूप रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में विवाह से पहले अथवा विवाह के कुछ ही दिनों बाद हुई इन नृशंस हत्याओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के पतन का संकेत है।भारतीय संस्कृति ने परिवार को केवल सामाजिक संस्था नहीं माना, बल्कि धर्म, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का प्रथम विद्यालय माना है।
संयुक्त परिवार में दादा-दादी केवल बुजुर्ग नहीं होते थे, वे अनुभवों के विश्वविद्यालय होते थे। नाना-नानी केवल रिश्तेदार नहीं, बल्कि संस्कारों के संरक्षक होते थे। बच्चों को कहानियों के माध्यम से धैर्य, करुणा, क्षमा, संयम और त्याग का पाठ पढ़ाया जाता था। घर का हर सदस्य दूसरे के दुःख का सहभागी होता था। इसलिए किसी एक व्यक्ति का तनाव पूरे परिवार की शक्ति से हल्का हो जाता था। आज यह सुरक्षा-कवच तेजी से टूट रहा है।
महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ में पति-पत्नी दोनों कार्यस्थल पर व्यस्त हैं। बच्चों का बचपन मोबाइल, टैबलेट और घरेलू सहायिकाओं के भरोसे बीत रहा है। जब बच्चा रोता है तो उसे गोद नहीं, मोबाइल थमा दिया जाता है। यह सुविधा का समाधान नहीं, संवेदनाओं का विस्थापन है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि ‘भावनाओं का विकल्प गैजेट्स नहीं हो सकते’, हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक चेतावनी है।





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