‘इकबाल-चेतना को जीवित रखने में जगन्नाथ आजाद का योगदान अविस्मरणीय’

सीसीएसयू के उर्दू विभाग में ऑनलाइन कार्यक्रम, प्रो. कुद्दूस जावेद बोले—आजाद ने आजादी के बाद इकबाल की विरासत को संभाले रखा

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग एवं एवोसा के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को ‘जगन्नाथ आजाद की इकबाल-चेतना’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने जगन्नाथ आजाद के साहित्यिक योगदान और अल्लामा इकबाल के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में उनकी भूमिका को याद किया।

मुख्य वक्ता अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आलोचक डॉ. तकी आबदी (कनाडा) ने कहा कि जगन्नाथ आजाद का अल्लामा इकबाल से पारिवारिक स्तर पर गहरा लगाव था। इकबाल के काव्य की प्रभावशीलता से प्रभावित आजाद को उनका संपूर्ण काव्य कंठस्थ था। उन्होंने इकबाल पर करीब 12-13 पुस्तकें लिखीं, जिनमें कई उच्च कोटि की मानी जाती हैं। उन्होंने कहा कि अल्लामा इकबाल की शायरी में सूफीवाद की सभी विशेषताएं मौजूद हैं और इकबाल इस्लाम को संपूर्ण जीवन-पद्धति मानते थे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफराहीम ने की। मुख्य अतिथि कश्मीर विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. कुद्दूस जावेद ने कहा कि देश की आजादी के बाद अल्लामा इकबाल की विरासत को जीवित रखने में जगन्नाथ आजाद का योगदान अद्वितीय रहा। वे इकबाल के महान प्रशंसक थे और उनके साहित्य पर किए गए कार्य को दोबारा पढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इकबाल द्वारा विश्वामित्र के गायत्री मंत्र का अनुवाद उनकी भारतीय सांस्कृतिक समझ का प्रमाण है। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में इकबाल के साहित्य को पढ़ाया जाना चाहिए।

कार्यक्रम की संरक्षकता उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। उन्होंने कहा कि जिस तरह अल्लामा इकबाल ने अपनी कविताओं के माध्यम से इस्लामी विचारधारा का प्रचार किया, उसी तरह उसे जन-जन तक पहुंचाने में जगन्नाथ आजाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इकबाल को समझने और समझाने वाले साहित्यकारों में आजाद का विशेष स्थान है।

डॉ. इरशाद स्यानवी ने विषय परिचय देते हुए कहा कि प्रो. जगन्नाथ आजाद उर्दू साहित्य के कर्मयोगी थे। कवि, साहित्यकार और आलोचक के रूप में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इकबाल अध्ययन के प्रति उनका गहरा लगाव उनकी पहचान बन गया था। उन्होंने इकबाल पर अनेक संगोष्ठियों और व्याख्यानों में विचार रखे।

जम्मू से जुड़े शोध-पत्र प्रस्तुतकर्ता इरफान आरिफ ने जगन्नाथ आजाद को सरल, आत्मसम्मानी और उत्कृष्ट साहित्यकार, जीवनीकार, कवि एवं शोधकर्ता बताया। पाकिस्तान से डॉ. यास्मीन कौसर ने कहा कि जगन्नाथ आजाद को इकबाल-चेतना अपने पिता तिलोकचंद महरूम से विरासत में मिली थी। जगन्नाथ आजाद की पुत्री मुक्ता लाल ने बताया कि उनके पिता इकबाल के साहित्य से बेहद प्रभावित थे और उन्हें ‘हाफिज-ए-कलाम-ए-इकबाल’ की उपाधि भी मिली थी।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. सगीर अफराहीम ने कहा कि इकबाल के संदर्भ में जगन्नाथ आजाद की सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि आज के जटिल सामाजिक परिवेश में जगन्नाथ आजाद जैसे साहित्यकार, आलोचक, शोधकर्ता और कवि की जरूरत है। उर्दू मीडिया, सूचना मंत्रालय और रेडियो स्टेशन के विकास में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ। स्वागत भाषण डॉ. इरशाद स्यानवी ने दिया और संचालन फरहत अख्तर ने किया। लखनऊ से प्रो. रेशमा परवीन, मॉरीशस से डॉ. सकीना रस्म अली तथा ढाका से प्रो. गुलाम रब्बानी, डॉ. आसिफ अली सहित अनेक शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं ऑनलाइन जुड़े।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts