"स्वाभिमान "
जैसा कि अमूमन सभी करते हैं, मैंने भी वही किया। तेजी से अपनी एक्टिवा दौड़ाई ताकि ट्रैफिक सिग्नल लाल होने से पहले चौराहा पार कर लूँ। मगर जेब्रा लाइन तक पहुँचते-पहुँचते सिग्नल लाल हो ही गया। नियम न तोड़ने की पुरानी आदत थी, सो वहीं रुक गया। दृष्टि सिग्नल पर टिकी थी और ध्यान भी।
"पेन ले लो बेटा।"
मैंने मुड़कर देखा। लगभग सत्तर-अस्सी वर्ष की एक वृद्धा खड़ी थी। उसकी मुट्ठी में चार-पाँच पेन थे। मन में आया, इतने सस्ते पेन का मैं क्या करूँगा? यही सोचकर फिर सिग्नल की ओर देखने लगा।
कुछ क्षण बाद वही आवाज़ फिर आई—
"ले लो बेटा... कुछ खाने को मिल जाएगा।"
उसने बदले में दो पेन मेरी तरफ बढ़ा दिए।
मैंने सहज ही कहा—
"रहने दो अम्मा, इनका क्या करूँगा।"
रास्ते भर एक ही प्रश्न मन को कचोटता रहा—वह भीख नहीं माँग रही थी, अपने श्रम का मूल्य चाह रही थी। और मैंने अनजाने में दान देकर कहीं उसके स्वाभिमान को ठेस तो नहीं पहुँचा दी थी?
हर फैला हुआ हाथ भीख के लिए नहीं होता।
- कमलेश कंवल, उज्जैन।






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