नीट में अटकी जान, गुणवत्ता से भटका ध्यान...!
- डा.ओम प्रकाश चौधरी
"क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रवेश परीक्षा पास करना रह गया है, या फिर एक अच्छा डॉक्टर तैयार करना?" आज यह प्रश्न पूरे देश के सामने पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल शिक्षा में प्रवेश का सबसे बड़ा माध्यम NEET (National Eligibility cum Entrance Test) बन गया है। इसका उद्देश्य पूरे देश में एक समान और पारदर्शी प्रवेश व्यवस्था लागू करना था। निस्संदेह, एक समान परीक्षा की अवधारणा में कई सकारात्मक पक्ष हैं, लेकिन समय के साथ यह भी स्पष्ट हुआ है कि नीट का अत्यधिक महत्व शिक्षा की मूल भावना पर भारी पड़ने लगा है।
आज लाखों विद्यार्थी दो-दो, तीन-तीन वर्षों तक केवल नीट की तैयारी में लगे रहते हैं। स्कूल और कॉलेज की नियमित पढ़ाई, प्रयोगात्मक ज्ञान, व्यक्तित्व विकास और विषय की गहरी समझ पीछे छूट जाती है। शिक्षा का लक्ष्य ज्ञान अर्जन नहीं, बल्कि केवल अधिक से अधिक अंक प्राप्त करना बन गया है।कोचिंग उद्योग तेजी से फल-फूल रहा है। जिन परिवारों के पास आर्थिक संसाधन हैं, वे महंगी कोचिंग का लाभ उठा लेते हैं, जबकि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थी पीछे रह जाते हैं। इससे अवसरों की समानता पर भी प्रश्न उठते हैं।
इसी संदर्भ में तमिलनाडु सरकार का रुख उल्लेखनीय रहा है। न्यायमूर्ति ए. के. राजन समिति ने व्यापक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया था कि नीट सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए बाधा बन रहा है तथा सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व कम हो रहा है। समिति की सिफारिशों के आधार पर तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित कर राज्य को नीट से छूट देने का प्रस्ताव रखा। हालाँकि, संघ सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी और नीट व्यवस्था यथावत जारी रही।
आज जब लगातार परीक्षा के स्वरूप, कोचिंग संस्कृति, मानसिक दबाव और शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न उठ रहे हैं, तब अनेक लोगों को लगता है कि तमिलनाडु सरकार ने जिस चिंता को वर्षों पहले व्यक्त किया था, वह दूरदर्शी थी। यह विचार-विमर्श का विषय अवश्य है कि क्या वर्तमान व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह पूरा कर रही है, या उसमें सुधार की आवश्यकता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी प्रवेश प्रणाली का मूल्यांकन उसके घोषित उद्देश्यों और वास्तविक परिणामों- दोनों के आधार पर होना चाहिए। यदि एक व्यवस्था पारदर्शिता तो बढ़ाती है, लेकिन साथ ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक समानता और विद्यार्थियों के समग्र विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, तो उसके सुधार पर गंभीर चर्चा स्वाभाविक है।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध की नहीं, बल्कि संतुलित समाधान खोजने की है। ऐसा समाधान, जिसमें पारदर्शिता भी बनी रहे, प्रतिभा का सम्मान भी हो, और मेडिकल शिक्षा केवल परीक्षा की तैयारी तक सीमित न रह जाए। क्योंकि,अंततः समाज और देश को केवल नीट टॉपर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, कुशलऔर उत्कृष्ट डॉक्टर चाहिए।
(सेवानिवृत्त प्रोफेसर, श्री अग्रसेन महिला पीजी कालेज, वाराणसी)






No comments:
Post a Comment