भविष्य तलाशती युवा पीढ़ी
- प्रो नंदलाल
भारतवर्ष की जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। इसमें युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और जीवन यापन करने के लिए सभी को कुछ न कुछ करना पड़ता है जहां से दो पैसे की आमदनी हो सके और परिवार का उदर भरण हो सके। भारतीय युवा भी इसके लिए दिन भर प्रयास करते हैं किंतु जनसंख्या इस कदर बढ़ रही है कि जीवन यापन का सर्वाधिक बड़ा भाग खेती सिकुड़ती जा रही है और पशु पालन में कुछ संभावना बरकरार है। पर पढ़े लिखे युवा पशुपालन भी करना नहीं चाहते।
इस देश में जीवन निर्वहन के दो ही मुख्य विकल्प थे कृषि और सरकारी नौकरी। शिक्षा आत्मज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान, मूल्य वृद्धि, जीवन प्रबंधन इत्यादि के लिए हुआ करती थी पर जैसे ही पूंजीवाद और भौतिकवाद ने अपने पांव पसारने शुरू किए लोगों की आवश्यकताएं, इच्छाएं और खेती किसानी से विरक्ति उन्हें नौकरी या रोजगार करने पर विवश करती गई। चार पांच दशक पूर्व तक नौकरी को बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता था। गांवों में लोग कहा करते थे कि उसके घर में बहुत गरीबी थी इसलिए उसने मिल में काम करना भी स्वीकार कर लिया। उसने सिपाही की नौकरी करनी शुरू कर दी। पहले कहावत कही जाती थी--
उत्तम खेती मध्यम बान
निषिद्ध चाकरी भीख निदान।
खेती को उत्तम माना जाता था, व्यवसाय या वाणिज्यिक कार्यों को मध्यम तथा नौकरी तो निषिद्ध थी और भीख मांगना निष्कृष्ट कार्य माना जाता था। समय के साथ दृष्टिकोण भी बदला और नौकरी सर्वोत्तम मानी जाने लगी तथा खेती किसानी निष्कृष्ट हो गई। यह पूंजीवाद के चलते हुआ।मैथिली शरण गुप्त ने लिखा---
शिक्षे तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी।
जब लोग पढ़ने लिखने लगे तो आत्मज्ञान और जीवन प्रबंधन एक कोने में खूंटी पर टंग गया और लोगों ने नौकरी के तरफ अपने पांव बढ़ा दिए। जो लोग नौकरी पा जाते थे उनका सम्मान समाज में बढ़ता गया और जो लोग खेती किसानी में लगते थे उन्हें नकारा माना जाने लगा। बहुत दिन तक यह स्थिति बनी रही आज भी युवाओं की शिक्षा तभी फलीभूत मानी जाती है जब वह नौकरी पा जाता है अर्थात समाज ने एक ऐसी दृष्टि विकसित कर ली जिसकी नजर में योग्य वही है जो नौकरी पा जाए तथा वे सभी मूरख हैं नकारा हैं जो नौकरी नहीं पाते भले वे खूब पढ़े लिखे हुए हों।
फिर समय ने करवट लिया और बढ़ती जनसंख्या नौकरी पर बोझ बन गई।सरकारों के पास इतनी भारी संख्या में पढ़े लिखे युवाओं के लिए रोजगार नहीं है न शासन इसका कुशल प्रबंधन कर रहा है। इस तरह सरकारों के ऊपर एक बहुत बड़ा दबाव पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं का है और दूसरी सबसे बड़ी कमी उत्पादकों की जरूरत और दिशाहीन होती शिक्षा और कौशलयुक्त शिक्षा के बीच मिसमैच की है। कॉरपोरेट सेक्टर को किस तरह के मानव संसाधन की जरूरत है तथा हम किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा हमारे संस्कृति को मजबूत तो कर सकती है पर वह पढ़े लिखे युवाओं को रोजगार देने में बहुत प्रासंगिक नहीं है। भूमंडलीकरण के कारण और वैश्विक स्तर पर अनेक समझौते होने से हमे वैश्विक मानकों के अनुसार चलना भी होगा। जब तक कॉरपोरेट सेक्टर नया कुछ सोचते हैं और भारतीय शिक्षा अपने करिकुलम को कॉरपोरेट के हिसाब से करती है तब तक वैश्विक स्तर पर उस टेक्नोलॉजी से आगे की टेक्नोलॉजी पर काम शुरू हो चुका रहता है। अर्थात हम उस गति से आगे नहीं बढ़ पाते जैसी जरूरत है।ऐसी दशा में हमारे युवा विद्यार्थी मिसफिट हो जाते हैं।
एआई और मशीन लर्निंग ने बची खुची आशा को भी नष्ट कर दिया है। इसने हजारों हजार युवाओं के रोजगार को लील लिया है। ऐसे में युवा भविष्य को देख रहे हैं और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें। यह एक गंभीर चुनौती है जिसे दिशा देनी होगी। यदि ऐसा नहीं किया गया तो देश में बेरोजगारों की ही जमात होगी। शिक्षा को दो दिशाओं में प्रमुखता देनी होगी।एक भारतीय शिक्षा पद्धति को तथा दूसरा स्किल एजुकेशन को।
पांचवीं की पढ़ाई के बाद हर छात्र के रुचि की परीक्षा करनी होगी। रुचि के अनुसार उसके सामने स्किल एजुकेशन का विकल्प रखना होगा जिससे वह अपना विकल्प चुन सके। उसे उसी लाइन में आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए। कमी है तो वहां प्रैक्टिकल अभ्यास करने के लिए अच्छे लैब का न होना। शिक्षा के क्षेत्र में प्रैक्टिकल लैब को पूरे देश में सुदृढ़ करना होगा अन्यथा यह सिर्फ नाम का ही रह जाएगा और स्किल एजुकेशन निरर्थक साबित होगा।
स्थाई जॉब बहुत कम रह गए हैं। हमने यह देखा है कि एक संविदा पद के लिए सैकड़ों ओवरक्वालिफाइड लड़के आते हैं। दिनभर अपना डॉक्यूमेंट्स चेक कराते हैं, शाम को इंटरव्यू देते हैं और उनसे कुछ पूछा भी नहीं जाता फॉर्मेलिटी कर दी जाती है और वे मुंह लटकाकर वापस चले जाते हैं। हम यह फौज क्यों तैयार कर रहे हैं। इस पर गंभीरता से चिंतन करना होगा और भविष्य के लिए एक सुदृढ़ स्टार्टअप देना होगा अन्यथा यह दबाव बढ़ता ही चला जाएगा।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)





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