गड्ढे हैं की मानते नहीं...!
- ललिता जोशी
अजी आजकल में बहुत चर्चा में हूँ । होंऊ भी क्यों न ? सड़क से संसद तक चर्चा का विषय हूँ । चुनाव तो पाँच वर्ष में एक बार आता है । मैं तो हर बरस आता हूँ । मुझे कोई रोक कर दिखा दे तो मान जाऊंगा । अरे भई जहां पर सड़क, पुल और फलाइओवर वहाँ-वहाँ मैं प्रकट हो जाता हूँ । मैं गवाह हूँ इन सड़कों, पुल और फलाइओवर के निर्माण और उसकी प्रक्रिया का । मेरा इन सभी के साथ चोली दामन का साथ है । सड़कों, पुलों और फलाइओवर जब बनते हैं तो कितने मखमली और रेशमी लगते हैं । जब ये नए -नए बनते हैं तो लोगों को इस पर अपने वाहन सरपट दौड़ाने का मन करता है । पहले पहल इन पर अपने वाहन दौड़ने का मन करता है ।
सिल्की सड़के अक्सर ड्राइविंग के शौकीन पेशेवर और शौकिया ड्राइवरों को आकृष्ट करती हैं । सुंदर और सिल्की सड़कें मानों इनकी प्रेयसी हो । मगर इन बेचारी सड़कों की सुंदरता कब तक बनी रहती है। ये एक यक्ष प्रश्न है। ट्रेफिक के दबाब के कारण बेचारी सड़कें अपना आपा खो बैठती हैं और जगह -जगह से चोटिल हो जाती है । बेचारी सड़क करें तो क्या करें !
एक ही बारिश सड़क की चमक -दमक को ऐसे धो डालती है जैसे की वो कभी गौरवान्वित थी ही नहीं और जन्मों से कुपोषण की यानि घटिया निर्माण सामग्री का शिकार हो । बेचारी में इतने गड्ढे हो जाते हैं की समझ ही नहीं आता की सड़क में गड्ढे हैं या फिर गड्ढों में सड़क । मुझ गड्ढे से सभी भयभीत होते हैं । मिडियाकर्मियों के आँख का तारें हैं हम गड्ढे और सिविक एजेंसियों और यात्रियों के आँख और सुविधा की किरकिरी हैं हम गड्ढे । नेशनल चैनल की सुर्खियों में रहते हैं हम गड्ढे । गड्ढे तो दुर्घटना के कारक हैं इसीलिए हम गड्ढों को सड़क का खलनायक माना जाता है ।
अरे भाई हम खलनायक नहीं हैं । हम तो सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार के पोल खोलक हैं । सड़क निर्माण में इस्तेमाल की जाने वाली घटिया निर्माण सामग्री की जानकारी मंत्रियों से लेकर आम जनता तक हमारे कारण ही पहुँचती है । तभी तो प्रशासन उसे दुरुस्त करने के लिए चौंकन्ना हो जाता है ।
गड्ढों से होने वाली दुर्घटनाओं के कारण होने वाले जान -माल का अफसोस तो होता है लेकिन इन गड्ढों के जन्मदाता ठेकेदारों और भ्रष्ट तंत्र को कोई मलाल नहीं होता है । कसूरवार बेचारे गड्ढे को ही ठहराया जाता है । हम गड्ढे प्रथम दृष्ट्या आरोपी बन जाते हैं । असल में हमें बनाने का असली सूत्रधार तो भ्रष्ट तंत्र है । सुनने में यही आता है गड्ढे हो गए ।
इन गड्ढों के मूल में जायें कि इसका कारण क्या है ? ये अब सभी जानने लगे हैं कि गड्ढे क्यों होते हैं । कभी-कभी तो लगता है कि गड्ढे बिन सड़क सून । गड्ढे सड़क के नज़र बट्टु हैं । अरे भाई वो सड़क ही क्या जिसमें गड्ढे न हो । अगर सड़क में गड्ढे न हो तो सभी के कमाई के साधन बंद हो जाए तो बेचारे अपना परिवार कैसे पालेंगे और अपनी सात पुश्तें के लिए धन का संचय कैसे कर पाएंगे। इसीलिए तो परोपकारी गड्ढे सड़क से संसद तक अपनी धाक बनाए रखते हैं । इसीलिए गड्ढे तक तक नहीं मानेगे जब तक कि सड़क निर्माण तय मानकों के अनुसार नहीं बनाई जाती । गड्ढे समस्या के प्रतीक हैं । अगर ज़िंदगी में समस्या आ जाए तो हम अक्सर कहते हैं कि ज़िंदगी में आजकल गड्ढे हो गए हैं । गड्ढे विकास की गति में बाधक हैं ।
अगर हमें जीवन ,सड़क और विकास में गड्ढे नहीं चाहिए तो हमें अपने सिद्धांतों और निर्माण की नींव पुख्ता रखनी होगी तभी आप मुझे छुटकारा पाओगे नहीं तो कहते रह जाओगे गड्ढे हैं की मानते नहीं । वैसे चलते -चलते एक बात बता दूँ कि वृक्षारोपण और पौधरोपण के लिए पहले जमीन में गड्ढे ही किए जाते हैं तब कहीं जाकर धरा हरी -भरी बन पाती है । इतना ही गड्ढे में टाइम कैप्सूल भी दफन किया जाता है ताकि सदियों बाद भी भावी पीढ़ियों को अपने इतिहास का ज्ञान हो पाये । मैं हर्त्ता भी हूँ और कर्ता भी ।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)





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