इसरो की एक और बड़ी सफलता: एलवीएम-3 के लिए क्रायोजेनिक इंजन का अंतिम परीक्षण सफल
नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इसरो ने अपने सबसे शक्तिशाली प्रक्षेपण यान एलवीएम-3 (LVM-3) के सातवें परिचालन मिशन के लिए निर्धारित सीई-20 (CE-20) क्रायोजेनिक इंजन का अंतिम उड़ान परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह परीक्षण तमिलनाडु के महेंद्रगिरि स्थित इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स में किया गया। एलवीएम-3 (पूर्व नाम: जीएसएलवी एमके-3) इसरो का सबसे भारी रॉकेट है, जिसके ऊपरी चरण (अपर स्टेज) को शक्ति देने के लिए इस इंजन का उपयोग किया जाता है।
क्या होता है उड़ान स्वीकार्यता परीक्षण?
अंतरिक्ष अभियानों में रॉकेट को लॉन्च करने से पहले उसके इंजन की वास्तविक उड़ान जैसी परिस्थितियों में जांच की जाती है। इस टेस्ट के जरिए यह परखा जाता है कि इंजन वास्तविक उड़ान के दौरान सही ढंग से काम करेगा या नहीं। परीक्षण के दौरान इंजन की सभी प्रणालियों का प्रदर्शन पूरी तरह संतोषजनक पाया गया है। यह इंजन 19 टन से 22 टन तक के थ्रस्ट (धकेलने की क्षमता) पर काम करने के लिए प्रमाणित है।
शानदार ट्रैक रिकॉर्ड: यह इंजन अब तक एलवीएम-3 के लगातार आठ सफल मिशनों में शानदार प्रदर्शन कर चुका है, जिनमें चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और तीन वाणिज्यिक (कमर्शियल) मिशन भी शामिल हैं। इसके अलावा, गगनयान मिशन के लिए भी इस इंजन ने मानव मिशनों (ह्यूमन-रेटेड) के आवश्यक सुरक्षा मानकों को पूरा कर लिया है।
पहली बार 'नोजल सुरक्षा प्रणाली' (NPS) का इस्तेमाल
हाल ही में किए गए अंतिम उड़ान परीक्षण के दौरान सीई-20 इंजन का 22 टन थ्रस्ट पर परीक्षण किया गया। इस टेस्ट की खास बात यह रही कि इसमें पहली बार 'नोजल सुरक्षा प्रणाली' (NPS) का उपयोग किया गया।
क्या है नोजल? रॉकेट का वह हिस्सा जिससे अत्यधिक गर्म और तेज गति वाली गैसें बाहर निकलती हैं।
NPS का फायदा: यह तकनीक परीक्षण के दौरान नोजल को सुरक्षित रखती है और विशेष रूप से उच्च ऊंचाई (हाई-अल्टीट्यूड) जैसी जटिल परिस्थितियों में इंजन का परीक्षण आसान बनाती है। इसकी मदद से कम संसाधनों में परीक्षण किया जा सकता है और टेस्ट की अवधि भी बढ़ाई जा सकती है।


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