हरियाली बचाना जरूरी
 इलमा अज़ीम 
पर्यावरण संरक्षण किसी एक देश, सरकार या संस्था का विषय नहीं रह गया है। यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकट के आंकड़े चिंताजनक हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया, जब वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में लगभग 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। 

वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया तो सूखा, बाढ़, हीटवेव और अन्य प्राकृतिक आपदाएं और अधिक विनाशकारी रूप ले सकती हैं। प्लास्टिक प्रदूषण भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की लगभग 99 प्रतिशत आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जो स्वास्थ्य मानकों पर खरी नहीं उतरती है। वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष 70 लाख से अधिक लोगों की असमय मृत्यु होती है। भारत में भी लाखों लोग प्रदूषित वायु के कारण श्वसन, हृदय और अन्य गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे हैं। जल प्रदूषण की स्थिति भी चिंताजनक है। देश के अनेक नदी निगरानी केंद्रों पर जल गुणवत्ता मानकों से नीचे पाई गई है, जिससे मानव स्वास्थ्य और जलीय जीवन दोनों प्रभावित हो रहे हैं। 

कोरोना महामारी के दौरान जब मानवीय गतिविधियां सीमित हुईं, तब प्रकृति में उल्लेखनीय सुधार भी देखने को मिला था। कई शहरों में वायु गुणवत्ता बेहतर हुई, नदियों का जल अधिक स्वच्छ दिखाई दिया और वन्यजीवों की गतिविधियों में वृद्धि दर्ज की गई थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रकृति में स्वयं को पुनर्जीवित करने की अद्भुत क्षमता है, आवश्यकता केवल उसे पर्याप्त अवसर देने की है। पर्यावरण संरक्षण में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि बचपन से ही विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जाए, तो वे आगे चलकर जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाने चाहिए ताकि यह विषय केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार का हिस्सा भी बने।



 सरकारों की भूमिका भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार का ‘लाइफ मिशन’ एवं ‘स्वच्छ भारत मिशन’ तथा ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियान भी जनभागीदारी को प्रोत्साहित कर रहे हैं। लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन और जनता के सहयोग पर निर्भर करती है। अंतत: पर्यावरण संरक्षण केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति के बिना मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।

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