कर्म बनाम भाग्य
- नीलमणि,
नवंबर की गुलाबी ठंड थी। मैं और सिया पार्क में टहल रहे थे। पत्तों पर ओस की नमी थी और बातचीत का विषय जाने कैसे उस शाश्वत प्रश्न पर टिक गया- कर्म बड़ा या भाग्य? तर्कों के तराज़ू में कभी कर्म का पलड़ा भारी होता, कभी भाग्य का। तभी मेरे मन में एक कहानी कौंध गई…
मोहल्ले में बाढ़ का कहर था। नदी का पानी उफान पर था और घरों की दीवारें डूब चुकी थीं। लोग जान बचाने के लिए ऊपर की मंज़िलों और छतों पर शरण ले चुके थे। चारों ओर पानी ही पानी, लहरों की गूँज और सन्नाटा। राहत बचाव दल नाव लेकर पहुँचा। लोगों को छतों से उतार-उतार कर सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया जाने लगा। इसी मोहल्ले की एक छत पर एक जोड़ा खड़ा था। बचाव दल तीन बार उनके पास गया और कहा– “आइए, हम आपको सुरक्षित जगह ले चलते हैं।”
लेकिन हर बार उस जोड़े ने उत्तर दिया– “नहीं! भगवान हमें बचाएँगे।” दल आगे बढ़ गया।
दिन बीते, तीन और रातें गुजर गईं। पानी घटने का नाम न ले रहा था। भूख-प्यास, डर और सन्नाटे ने दोनों को घेर लिया। अब वे रोते हुए हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगे–
“हे प्रभु! हमने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया। फिर आज हम इस कठिनाई में क्यों हैं? आप हमारी मदद क्यों नहीं कर रहे?”
और तभी एक आवाज़ आई–
“मैं तुम्हारे पास आया था- तीन बार, नाव लेकर। लेकिन हर बार तुमने मुझ पर भरोसा करने के नाम पर, उस कर्म को ठुकरा दिया, जो तुम्हें बचाने आया था।”
जोड़ा स्तब्ध रह गया। भाग्य हमेशा कर्म के हाथों से ही रास्ता खोलता है। ईश्वर मदद करता है, लेकिन इंसान को पहचानना होता है कि प्रभु का सहारा किस रूप में आया है।
सिर्फ इंतज़ार करने से कुछ नहीं होता, कर्म ही भाग्य की असली कुंजी है।



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