सितम सिस्टम का...!
- ललिता जोशी
देश की राजधानी दिल्ली अधिकांश लोगों को अपनी और आकृष्ट करती । किसी को पढ़ाई के लिए तो किसी को रोजगार के लिए तो किसी को इलाज के लिए । कुल मिलाकर कह सकते हैं कि सपनों को पंख देती है दिल्ली । बहुत से युवा अपने भविष्य के लिए दिल्ली आते हैं और अच्छी नौकरियों के लिए कोचिंग लेते हैं । कोचिंग का ये धंधा इतना चल पड़ा है कि जगह -जगह कोचिंग सेंटर खुल गए हैं । कोचिंग की ये बीमारी छोटे से लेकर बड़े शहरों तक पसर गई है । अभी हाल ही में दिल्ली के साकेत में एक इमारत भरभरा कर गिर गई और यहाँ चलने वाले कोचिंग सेंटर के कई छात्रों का जीवन समाप्त हो गया । इससे पहले दिल्ली के ही करोलबाग में एक कोचिंग सेंटर में भी आईएएस अस्पिरंट्स की मृत्यु हो गई । इसके बाद करोलबाग के स्मार्ट बाज़ार में अग्नि कांड हुआ ।
ऐसी घटनाएं न जाने कितनी जगह ऐसा हुई हैं । इससे पहले गोवा में भी एक अग्निकांड हुआ और वहाँ भी बहुत से पर्यटक काल के गाल में समा गए । न कितने ही अस्पतालों में आग लगती ही रहती है और लोग की मृत्यु हो जाती है । ठीक ऐसे ही पिछले महीने ही विवेक विहार में एक घर में आग लगी और एक ही परिवार के सभी सदस्य नींद में ही जल कर खाक हो गए । हाल में साकेत में एक बिल्डिंग ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर गिर गई न जाने किन घरों के चिराग बुझ गए अपने सपनों के साथ । अभी ये थमा नहीं था की मुकुंदपुर में सिलेंडर ब्लास्ट से एक बिल्डिंग के परख्च्चे उड़ गए और जिंदगियाँ भी । अभी ये हुआ ही था कि अब मालवीय नगर के होटल में 21 जिंदगियाँ समाप्त हो गईं । क्या कसूर था इन सब का ?
प्रशासन की नाक के नीचे ताबड़-तोड़ बनती बिल्डिंगें और ऐसे निर्माण कार्यों की सूचना जब संबन्धित अधिकारियों को दी जाती है तो उनके कान पर जूं भी नहीं रेंगती है । पुलिस के पास जाओ तो वो एमसीडी के पास भेज देती है । बस प्रभावित होने वाला आदमी इधर से उधर टक्कर खाता रहता है । आखिरकार कोर्ट की शरण में जाना पड़ता है । मगर दीगर की बात है कि सिविक एजेंसियां कोर्ट में झूठे हल्फनामें दे देते हैं । साकेत वाले मामले में एक याचिकाकर्ता ने कोर्ट में याचिका दायर की थी कि इस बिल्डिंग में अवेध निर्माण चल रहा है और इससे आस-पास की बिल्डिंगों को खतरा है जब कोर्ट ने संबन्धित एजेंसियों को तलब किया तो उन्होने कोर्ट में ही झूठा हलफनामा दे दिया। आकंठ भ्रष्टाचार लिप्त सिविक एजेंसियों के अधिकारी ,कार्मिक और ठेकेदार खुद तो अंधी कमाई के चक्कर में रहते हैं । इनकी आँखों पर लालच की इतनी मोटी पट्टी बंधी हुई है । इन्हें बस पैसा और पैसा ही दिखाई देता है । इनके लालच को देखकर लगता है कि ये बस पैसा ही खाते हैं भोजन की जगह । अक्सर हम सिस्टम पर आरोप लगाते हैं कि सिस्टम भ्रष्ट है । क्या हमने कभी गहराई से सोचा है कि इन एजेंसियों को भ्रष्ट कौन बनाता है ? जब हम गलत काम करते हैं और किसी की शिकायत पर एजेंसियां निरीक्षण के लिए आती हैं तो हम उनसे अपने गलत काम को सही ठहराने के लिए उन्हें रिश्वत देते हैं ।
अभी साकेत और मालवीय नगर में जो कांड हुआ है उनको देखकर पता चलता है की स्वीकृति थी केवल छ:कमरों की बनाए गए 21 कमरे ऐसे ही साकेत में चार मंजिल की स्वीकृति थी और बना दी पाँच मंजिल । अपने लाभ के लिए हम सभी खुद ही उल्टे काम करते हैं और एजेंसियों को पैसा ठूंसते है ताकि वो कोई प्रतिकूल रिपोर्ट न दें । तो दोष किसे दें ? फिर भी एजेंसियों को अपनी भूमिका ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से निभानी चाहिए । आम आदमी का लालच ही सिस्टम को पैसा देकर अपनी ओर करने की पुरजोर कोशिश करता है । इसमें वो सफल भी हो जाते हैं । इसके दूरगामी परिणाम कितने घातक होते हैं । ये तो हम सभी देख रहें हैं । कहीं पर ज़मींदोज़ होती इमारतों में जिंदगियाँ दफन हो गईं तो कहीं पर इलाज के लिए आए लोग जिंदा ही आग में जल गए । जब -जब ऐसे हादसे होते हैं तब -तब प्रशासन हरकत में आता है और थोड़े दिनों में सब कुछ पुराने ढर्रे पर चलने लग जाता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो । न जाने कितने ही घर पैसे के लालच ने उजाड़ दिये हैं । जिनका दंश उनके परिवार ताउम्र झेलते रहते हैं । उपहार सिनेमा कांड में कितने ही लोगों और बच्चों की जान चली गई और उनके परिजनों को न्याय के लिए अदालत की शरण में जाना पड़ा एक ओर तो अपनों को खोने का दुख तो दूसरी ओर अदालतों के चक्कर । कई बार तो ये सब देख कर लगता है कि हमारे डीएनए में बेईमानी , हथियाने की प्रवृति जन्मजात है । इतना सब कुछ होने पर हम कहाँ चेते हैं । इन अनाधिकृत निर्माण कार्यों के कारण मानसून में जलभराव की समस्या होती है । जो साल दर साल चलती ही आ रही है क्योंकि ड्रेन के लिए बनी छोटी नालियों को बंद कर उन्हें भी घेर लेते हैं । गंदी पानी से भरी गलियाँ तो दिखाई जाती हैं लेकिन इस समस्या के मूल पर कोई चर्चा नहीं ।
सरकार अगर स्मार्ट सिटी चाहती है तो उसे सबसे पहले अनाधिकृत निर्माण को हटाना होगा और वोट बैंक के लिए बसाई गई अवैध बस्तियों को हटाना होगा । इसके साथ ही इनकी बसावट में जो नेता ,अधिकारी और कार्मिक शामिल हों उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए । नहीं तो सिस्टम के सितम को रोते रहिए । आज अगर लाल डोरे के गावों और निजी कॉलोनियों ,डीडीए फ्लैट्स का सर्वे करा जाए तो न जाने क्या -क्या नियमों के विरुद्ध मिलेगा । टीवी की गर्मागर्म बहस और फिर मुआवजों की घोषणा हो जाएगी और फिर सब कोल्ड स्टोरेज में । यहाँ एक गीत के बोल याद आ रहे हैं :
कितने भी तू कर ले सितम हस -हस के सहेंगे हम
ये प्यार (अवैध निर्माण) ना होगा कम...!
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)






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