यूपी के लोगों के लिए बड़ी खुशखबरी, बिजली महंगी नहीं होगी

नियामक आयोग ने उत्तर प्रदेश पॉ़वर कॉरपोरेशन  के प्रस्ताव पर लगाई रोक

 लखनऊ ।  बिजली उपभोक्ताओं को नियामक आयोग की ओर से बड़ी राहत, नियामक आयोग का बड़ा फैसला, 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज को नियामक आयोग ने गैरकानूनी बताया।10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज की वसूली को गलत ठहराया, उपभोक्ता परिषद ने दाखिल किया था लोक महत्व प्रस्ताव, अब हर कीमत पर पावर कारपोरेशन को 10 प्रतिशत बिजली सरचार्ज का फैसला वापस लेना होगा। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद द्वारा प्रदेश के 3 करोड़ 73 लाख विद्युत उपभोक्ताओं के हित में दाखिल जनहित एवं लोकमहत्व प्रत्यावेदन पर उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने गंभीरता दिखाते हुए कड़ा रुख अपनाया है।

आयोग ने प्रथम दृष्टया माना है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) द्वारा जून 2026 के बिजली बिलों में लागू किया गया 10 प्रतिशत ईंधन अधिभार (Fuel surcharge) नियामकीय प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। । पावर कॉरपोरेशन द्वारा जारी आदेश कानून का उल्लंघन है, निश्चित तौर पर पावर कारपोरेशन को अपना आदेश वापस लेने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। वहीं उपभोक्ताओं का कहना है कि पावर कारपोरेशन के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो।

उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष एवं केंद्र तथा राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार तथा सदस्य संजय कुमार सिंह से भेंट कर विस्तृत लोकमहत्व एवं जनहित प्रत्यावेदन प्रस्तुत किया था। परिषद ने आयोग को तथ्यों और आंकड़ों के साथ अवगत कराया कि फ्यूल एवं पावर परचेज कॉस्ट एडजस्टमेंट (एफपीपीसीए) की गणना में मार्च 2026 की वास्तविक बिजली खरीद लागत के साथ-साथ लगभग 1400 करोड़ रुपये के पुराने बकाया दावों एवं पूर्व अवधि की देनदारियों को भी जोड़ दिया गया, जो कानून और नियामकीय व्यवस्था के विपरीत है।

परिषद ने आयोग को बताया कि यदि यूपीपीसीएल ने विनियमों के अनुरूप सही गणना की होती तो जून 2026 में उपभोक्ताओं पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त भार डालने के बजाय लगभग 2 प्रतिशत की दर से बिजली बिलों में कमी लागू होती। परिषद का दावा है कि आयोग द्वारा स्वीकृत बिजली खरीद लागत लगभग 4.94 रुपये प्रति यूनिट थी, जबकि मार्च 2026 के लिए लगभग 5.86 रुपये प्रति यूनिट लागत दर्शाकर उपभोक्ताओं पर लगभग 1610 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल दिया गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए यूपीईआरसी ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। आयोग ने कहा है कि न्यायिक आदेशों के अनुसार देय बकाया राशि, एनटीपीसी को देय पुराने भुगतान, केंद्रीय ट्रांसमिशन उपयोगिता से संबंधित बकाया तथा अन्य ऐतिहासिक देनदारियों को एफपीपीएएस/एफपीपीसीए गणना में शामिल करने से उपभोक्ताओं पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। इससे आयोग को उन लागतों की प्रकृति, विवेकशीलता, स्वीकार्यता और वसूली की वैधता की जांच करने का अवसर नहीं मिल पाता।

आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ऐसा दृष्टिकोण न तो यूपीईआरसी एमवाईटी विनियम-2025 के विनियमन 16.1 के अनुरूप है और न ही उपभोक्ता संरक्षण के मूल सिद्धांतों से मेल खाता है। आयोग की राय है कि पिछली अवधि के बकाया एवं ऐतिहासिक देनदारियों को वर्तमान एफपीपीएएस गणना में शामिल करना विनियम 16.1 के प्रावधानों के साथ असंगत है।

इसी आधार पर आयोग ने यूपीपीसीएल को सात दिनों के भीतर विस्तृत स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। आयोग ने संबंधित माह के एफपीपीएएस की विस्तृत गणना, उसमें शामिल सभी मदों का विवरण, वर्तमान अवधि एवं पूर्व अवधि की बिजली खरीद लागत तथा ट्रांसमिशन शुल्क का पृथक विवरण, एपीटीईएल के आदेशों के अनुपालन में किए गए भुगतानों का ब्यौरा तथा वह कानूनी एवं नियामकीय आधार मांगा है जिसके तहत पिछली अवधि की देनदारियों को एफपीपीएएस गणना में शामिल किया गया।

उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि आयोग की टिप्पणियों से यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि यूपीपीसीएल द्वारा जारी 10 प्रतिशत ईंधन अधिभार का आदेश नियामकीय कसौटी पर टिकता नहीं है। परिषद का मानना है कि अब पावर कॉरपोरेशन को अपना आदेश संशोधित करना पड़ेगा और उपभोक्ताओं पर डाला गया अतिरिक्त वित्तीय भार वापस लेना होगा।

उन्होंने कहा कि फरवरी 2026 में भी उपभोक्ताओं से 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज वसूला गया था, जिस पर आयोग पहले ही स्पष्टीकरण मांग चुका है और वह मामला अभी लंबित है। ऐसे में जून 2026 में पुनः 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज लागू करना उपभोक्ता हितों के विपरीत है।

उपभोक्ता परिषद ने आयोग से मांग दोहराई है कि जून 2026 में लागू 10 प्रतिशत अतिरिक्त वसूली पर तत्काल रोक लगाई जाए, फ्यूल सरचार्ज की गणना में शामिल पुराने दावों की स्वतंत्र जांच कराई जाए, महंगी बिजली खरीद के कारणों की समीक्षा की जाए तथा उपभोक्ताओं के हित में उपलब्ध अधिशेष धनराशि का समायोजन सुनिश्चित किया जाए। परिषद ने विश्वास व्यक्त किया है कि आयोग उपभोक्ता हितों की रक्षा करते हुए कानून एवं विनियमों के अनुरूप अंतिम निर्णय देगा ।

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