विकास और पर्यावरण
 इलमा अज़ीम 
पर्यावरणीय संकट का मूल कारण विकास की वह अवधारणा है, जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन और उपभोग की वस्तु मान लिया गया है। हमने जंगलों को उद्योगों के लिए, नदियों को अपशिष्ट के लिए और भूमि को कंक्रीट के जंगलों में बदलने के लिए प्रयोग किया। प्रकृति हमें जीवन का आधार निःशुल्क देती है, लेकिन हमने उसके प्रति कृतज्ञता के बजाय दोहन का व्यवहार अपनाया। परिणामस्वरूप वनस्पतियों का विनाश, वन्य जीवों का संकट, भूमिगत जल का क्षय और प्रदूषण का विस्तार निरंतर बढ़ रहा है। भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना है। वृक्षों, नदियों, पर्वतों और वनस्पतियों को केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता के रूप में देखा गया। 

आयुर्वेद और वनौषधि विज्ञान इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों ने हजारों वर्षों तक मानव स्वास्थ्य की रक्षा की, लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में यह ज्ञान और प्राकृतिक संपदा दोनों उपेक्षित होते गए। आज जब नई-नई बीमारियां मानव जीवन को चुनौती दे रही हैं, तब पुनः प्रकृति और वनस्पति जगत की ओर लौटने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। 

वर्तमान संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और नैतिक संकट भी है। वायु प्रदूषण लाखों लोगों की असामयिक मृत्यु का कारण बन रहा है। जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। कृषि व्यवस्था प्रभावित हो रही है। मौसम चक्र असंतुलित हो गया है। गरीब और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। 

भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनों की कमी नहीं है। 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम से लेकर अनेक पर्यावरणीय कानून बनाए गए। लेकिन कानूनों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई बनी हुई है। अवैध खनन, वनों की कटाई, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की अनदेखी और पर्यावरणीय मंजूरियों में शिथिलता इस बात का प्रमाण हैं कि संस्थागत इच्छाशक्ति अभी भी पर्याप्त नहीं है।

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