मेरठ से भड़की थी आजादी की पहली ज्वाला
रहस्यमयी साधु ने भी तैयार की थी क्रांति की जमीन
मेरठ। क्रांति दिवस की पूर्व संध्या पर मेरठ कॉलेज के डॉ. रामकुमार गुप्ता सभागार में इतिहास विभाग द्वारा “1857 की क्रांति और मेरठ की भूमिका” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में इतिहासकारों ने 1857 की क्रांति से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में सैकड़ों शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की।
मुख्य वक्ता प्रो. के. डी. शर्मा ने कहा कि मेरठ छावनी स्थित तीसरी देसी अश्व सेना के परेड ग्राउंड पर 24 अप्रैल 1857 को चर्बी लगे कारतूसों के प्रयोग से इनकार करने वाले 85 सैनिकों ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। उन्होंने बताया कि कर्नल कारमाइकल स्मिथ के आदेश पर सबसे पहले नायक शेख पीर अली को कारतूस देने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कारतूस देखने तक से इनकार कर दिया। इसके बाद नायक कुदरत अली ने भी यह कहते हुए कारतूस लेने से मना कर दिया कि यदि पूरी पलटन कारतूस लेगी तभी वह भी लेगा। इसके बाद एक-एक कर 85 सैनिकों ने कारतूस लेने से इंकार कर दिया, जबकि केवल पांच सैनिकों ने आदेश माना।
प्रो. शर्मा ने बताया कि 6, 7 और 8 मई को चले कोर्ट मार्शल में इन सैनिकों को दोषी ठहराकर 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। 9 मई को सैनिकों के सार्वजनिक अपमान ने जनाक्रोश को भड़का दिया और 10 मई 1857 को मेरठ से क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी, जिसने पूरे देश में स्वतंत्रता संग्राम का स्वरूप ले लिया।
संगोष्ठी में प्रो. प्रज्ञान चौधरी ने क्रांति के स्वरूप से संबंधित अनेक तथ्य रखे। डॉ के डी शर्मा ने क्रांति से जुड़ी रहस्यमयी साधु की कहानी का उल्लेख करते हुए कहा कि 10 अप्रैल 1857 को एक साधु अपने 50-60 शिष्यों के साथ मेरठ आया था और सूरजकुंड स्थित मनोहरनाथ मंदिर में ठहरा था। आश्चर्य की बात यह थी कि उसके पास सामान्य नागरिकों की अपेक्षा छावनी के सैनिक अधिक आते थे। 13 अप्रैल को छावनी में आगजनी की घटनाएं भी हुईं। बाद में प्रशासन के दबाव में साधु को वहां से हटाया गया, लेकिन उसके कई शिष्य आसपास के गांवों में रुक गए। इतिहासकारों का मानना है कि यह घटनाएं क्रांति की पूर्व योजना और जनजागरण से जुड़ी हुई थीं।
प्राचार्य प्रो. युद्धवीर सिंह ने कहा कि 1857 की क्रांति केवल सैनिक विद्रोह नहीं थी, बल्कि यह भारतीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता चेतना का पहला व्यापक संगठित आंदोलन था। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को इस गौरवशाली इतिहास से परिचित कराना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम का संचालन इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. अर्चना सिंह ने किया, जबकि संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. चंद्रशेखर भारद्वाज रहे। अंत में सभी वक्ताओं ने मेरठ की ऐतिहासिक भूमिका को राष्ट्र के गौरव का प्रतीक बताया। संगोष्ठी में प्रो कपिल सिवाच, प्रो पंजाब मलिक, प्रो सीमा पंवार, प्रो अनिल राठी एवं अन्य गणमान्य लोग शामिल रहे।


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