सीसीएसयू के प्रो. विजय मलिक, सुमित मलिक और डॉ. इनाम मलिक की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि
उत्तर भारत में खोजी नई प्रजाति (बाला की नई प्रजाति की खोज
गठवाला खाप के सम्मान में इसका नाम (सीदा गठवालारम) रखा)
मेरठ। सीसीएसयू के वनस्पति विज्ञान विभाग ने एक बार फिर वैज्ञानिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर विजय मलिक, शोधार्थी सुमित मलिक एवं डॉ. इनाम मलिक ने मालवेसी (Malvaceae) कुल की एक नई पौध प्रजाति की खोज कर विश्वविद्यालय तथा उत्तर भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है। हाल ही में इस नई प्रजाति को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका PhytoKeys में प्रकाशित किया गया है।
सुमित मलिक और इनाम मलिक प्रोफेसर विजय मलिक के रिसर्च स्कॉलर हैं। सुमित मलिक वर्तमान में सीसीएस विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग में प्रोफेसर विजय मलिक की देखरेख में अपनी पीएचडी कर रहे हैं ।आजकल डॉ. इनाम मलिक पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट हरिद्वार में वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर रहे हैं । इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम सीदा गठवाला न्र्र रखा गया है। शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका PhytoKeys में प्रकाशित किया गया है, जिससे यह खोज वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय तक पहुंची है।
वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में Sida वंश की लगभग 20 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें कई प्रजातियां औषधीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद में Sida वंश को सामान्यतः “बाला” नाम से जाना जाता है। विभिन्न प्रजातियों को उनके विशिष्ट गुणों के आधार पर अलग-अलग नाम दिए गए हैं, जैसे Sida rhomboidea* को “महाबला”, Sida rhombifolia को “अतिबला” तथा Sida spinosa को “नागबला” कहा जाता है। वहीं Sida cordifolia को सामान्यतः “बाला” के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इन पौधों का उपयोग सूजन, बुखार, कमजोरी, नसों की दुर्बलता, त्वचा रोग एवं अन्य शारीरिक समस्याओं के उपचार में किया जाता रहा है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि नई खोजी गई प्रजाति Sida gathwalarum भविष्य में औषधीय, पारिस्थितिक एवं जैव विविधता संबंधी अध्ययनों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। इस प्रकार की नई प्रजातियां भविष्य में औषधीय यौगिकों की खोज, पर्यावरणीय संरक्षण तथा पौध विविधता के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए नई संभावनाएं खोल सकती हैं।
यह नई प्रजाति उत्तर भारत में किए गए विस्तृत वनस्पति सर्वेक्षण एवं गहन वैज्ञानिक अध्ययन के दौरान खोजी गई। शोधकर्ताओं ने कई वर्षों तक क्षेत्रीय अध्ययन, पौधों के सूक्ष्म लक्षणों का परीक्षण, हर्बेरियम नमूनों की तुलना तथा आधुनिक वर्गिकी (Taxonomy) तकनीकों का उपयोग कर यह सिद्ध किया कि यह पौधा विज्ञान के लिए पूर्णतः नई प्रजाति है।
प्रो. विजय मलिक ने बताया कि भारत जैव विविधता की दृष्टि से विश्व के समृद्ध देशों में शामिल है, लेकिन अभी भी अनेक पौध प्रजातियां ऐसी हैं जिनका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि नई प्रजातियों की खोज केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, औषधीय संभावनाओं और पारिस्थितिकी संतुलन को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रो. विजय मलिक ने बताया कि नई प्रजाति का नाम Sida gathwalarum उत्तर भारत के एक पारंपरिक समुदाय गठवाला खाप के सम्मान में रखा गया है, क्योंकि इस प्रजाति के खोजकर्ता गठवाला खाप से हैं।
शोधार्थी सुमित मलिक ने जानकारी देते हुए बताया कि इस पौधे में कई विशिष्ट लक्षण पाए गए हैं, जिनके आधार पर इसे अन्य निकट संबंधी प्रजातियों से अलग पहचाना गया। पौधे की पत्तियों की संरचना, पुष्पों की बनावट, बीजों की विशेषता एवं सूक्ष्म आकृतिक गुण इसे एक नई प्रजाति सिद्ध करते हैं। उन्होंने कहा कि इस खोज के पीछे लंबे समय तक कठिन फील्डवर्क, क्षेत्रीय यात्राएं और निरंतर वैज्ञानिक अध्ययन का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
डॉ. इनाम मलिक का भी इस शोध कार्य में महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने क्षेत्रीय सर्वेक्षण, पौध नमूनों के संकलन, वैज्ञानिक अभिलेखीकरण, फील्ड डाटा संग्रहण तथा संबंधित प्रजातियों के तुलनात्मक अध्ययन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके वैज्ञानिक मार्गदर्शन एवं तकनीकी सहयोग से शोध कार्य को नई दिशा मिली। शोध टीम ने बताया कि इस खोज को सफल बनाने में सभी सदस्यों के सामूहिक प्रयास, वैज्ञानिक समर्पण और निरंतर अनुसंधान का विशेष योगदान रहा है।
वनस्पति विज्ञान विभाग के शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सफलता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक अनुसंधान का प्रमाण है। इससे युवा शोधार्थियों को जैव विविधता, पर्यावरण संरक्षण और वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में नए शोध कार्यों के लिए प्रेरणा मिलेगी।
वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में अभी भी अनेक दुर्लभ और अज्ञात वनस्पतियां मौजूद हैं, जिनकी खोज भविष्य में महत्वपूर्ण औषधीय और पर्यावरणीय उपयोगों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। नई प्रजाति की खोज से यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय वनस्पति विज्ञान अनुसंधान विश्व स्तर पर तेजी से अपनी पहचान बना रहा है।
यह उपलब्धि न केवल चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए गर्व का विषय मानी जा रही है। स्थानीय सामाजिक संगठनों एवं शिक्षाविदों Dr Rama Kant, Dr Sudhil Kumar, Dr Ashok Kumar, Dr Sachin Kumar & Dr Ishwar Singh ने भी प्रो. विजय मलिक, सुमित मलिक एवं डॉ. इनाम मलिक को बधाई देते हुए इसे भारतीय विज्ञान एवं संस्कृति के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है।


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