भारतीय अर्थव्यवस्था नोटबंदी के आईने में


- प्रो. नंदलाल
आज हमारे देश के प्रधानमंत्री देश की जनता को बार बार यह संदेश दे रहे हैं और जागरूक कर रहे हैं कि अपने खर्च को सम्हाल कर करिए। लोग पेट्रोल,डीजल,गैस के खर्च में कटौती करें।सार्वजनिक वाहनों का अधिकाधिक उपयोग करें। सोने की खरीदारी एक साल के लिए स्थगित रखें। विवाह शादी के खर्च में कटौती करें।विदेश यात्रा स्थगित करें।समय खराब आने वाला है।वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता दी जाय। मीटिंग जैसे आवश्यक कार्यों को ऑनलाइन संपादित किया जाय तथा छात्रों की कक्षाएं भी यथासंभव ऑनलाइन चलाई जाएं। ये हिदायतें बार बार दी जा रही हैं। भारत की जनता को यह अंदेशा था कि यह स्थिति तो अवश्य आएगी क्योंकि वर्तमान सरकार चौंकाने वाला निर्णय लेती है।

इधर वैश्विक स्तर पर इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला करके पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मार दी। नेतन्याहू और ट्रंप विश्व के ऐसे नेता हुए जो पूरी दुनिया को दर किनार करते हुए ऐसा तांडव मचाया जिससे दुनिया की अर्थ व्यवस्था हिलने लगी। ऐसे राष्ट्रध्यक्षों के साथ न जाने हमने कितने समझौते कर डाले हैं जो किसी की नहीं सुनते। गनीमत यह रहा कि इसने तीसरे विश्वयुद्ध का रूप नहीं लिया अन्यथा वैश्वीकरण अभिशाप बन जाता और न जाने कितने देश आर्थिक गुलामी के शिकार हो जाते।वैश्विक स्तर पर हुए विभिन्न समझौतों ने देशों के हाथ बांध रखे हैं और हमें वह भुगतने के लिए तैयार रहना होगा जो अमेरिका और इजराइल जैसे राष्ट्र कल्पना करके बैठे हैं।
    हम सतत अपने कार्य संस्कृति में परिवर्तन लाकर,अनुकूल पूंजी निवेश का वातावरण निर्मित कर अपने देश को आगे ले जाना चाहते हैं।हमारे भी अपने सपने हैं,हमारी भी अपनी कल्पनाएं हैं जो अपने देश की उन्नति के लिए चाह रहे हैं पर ट्रंप जैसे व्यक्ति से क्या उम्मीद की जा सकती है जो कहता कुछ और है करता कुछ और है।वैश्विक स्तर पर इनके दबदबे से कोई राष्ट्र अछूता नहीं है।लेकिन हमें कभी कभी स्वतंत्र ख्वाब भी देखने की जरूरत है।जैसा पंडित अटल बिहारी बाजपेई ने परमाणु विस्फोट के समय देखा था।वह निर्णय सराहनीय था तथा भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा था।एक स्वर से समूचे राष्ट्र ने उस निर्णय का स्वागत किया तथा विश्व में हमने अपने झंडे को बुलंद किया।बाजपेई जी की लाहौर बस यात्रा भी सराहनीय रही जिसका समूचे देश ने स्वागत किया पर प्रमादियों और बड़बोलो को आज तक किसने बांध कर रखा।लाहौर बस यात्रा के अंतस्थल में तो युद्ध छिपा था सो हुआ और कारगिल में हमे विजय श्री मिली।

बड़े आत्म विश्वास के साथ हम आगे बढ़ रहे थे। हम विश्व गुरु भी बनना चाह रहे हैं।अधोसंरचना के विकास में हमने अच्छे कार्य भी किए लेकिन हमारी तथाकथित आत्मनिर्भरता एक छोटे युद्ध अमेरिका और ईरान चंद दिनों में ही व्याकुल हो उठी। हम कह तो रहे हैं कि हमारे पास तेल,गैस और खाद की कोई कमी नहीं है तो दूसरी तरफ जनता को आगाह भी कर रहे हैं कि अपने खर्च पर लगाम लगाइए,कोरोना से भी खतरनाक स्थितियां आने वाली हैं।हमारी आत्मनिर्भरता किन क्षेत्रों में है कि हम चंद दिनों की कठिन स्थिति के लिए कोरोना जैसी स्थिति की बात करने लगे हैं।भारत की आर्थिक व्यवस्था ऐसी नहीं थी कि हम अल्पकालिक झंझावातों को झेलने में असमर्थ होते पर हमारी रहस्यमयी अर्थ व्यवस्था को उस समय बड़ा आघात लगा जब देश में अचानक नोटबंदी की घोषणा हुई।ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत सी संपदा छुपा के रखी जाती थी।क्योंकि ग्रामीण लोगों में भविष्य उन्मुखता अधिक पाई जाती है।

भविष्य के आपातकालीन झंझावातों से निपटने के लिए आपने देखा होगा कि गांवों में लोग बरसात के दिनों के लिए सब्जियों को सुखा के रख लेते हैं।बरसात में चूंकि सब्जियां कम और महंगी हो जाती हैं इसलिए गांव वाले उसकी पूर्ति के लिए पहले से ही अपनी व्यवस्था बना के रखते हैं।ईंधन के लिए जाड़े के समय से ही गोबर के कंडे बनाना शुरू कर देते हैं और गर्मी तक तैयार हो जाने तथा बरसात शुरू होने से पहले उसे घर के अंदर रख लेते हैं।

हर भारतीय महिला सोने, चांदी और नगदी के रूप में कुछ न कुछ छुपा के रखती थीं पर नोटबंदी ने उनके भविष्य उन्मुखता की कमर तोड़ दी।एक एक रुपए खोज खोज कर बैंकों में जमा करा दिए गए।उनके पास किसी तरह का कोई गुप्त मुद्रा नहीं बची, सब कुछ सामने आ गया और जो सामने आ गया वह तो कैलकुलेटेड होता है।सो हमारी रहस्यमयी अर्थ व्यवस्था दुनिया के बाजार में नंगी हो गई।हम कहां विश्व में तीसरी बड़ी इकॉनमी बनने जा रहे थे और कहां हम छठे स्थान पर पहुंच गए।इसलिए वाहवाही के चक्कर में बिना सोचे समझे कोई कदम उठाना अपने को ही नुकसान पहुंचाता है।

    आज लोग सचेत तो हैं पर उन्हें नहीं पता कि जिस गैस के चूल्हे पर खाना पकाने की आदत डलवा दी गई वह गैस बाहर से आयातित होती है और हम इसके लिए खाड़ी देशों पर पूरी तरह निर्भर हैं। पेट्रोल,डीजल,खाद सभी कुछ बाहर से आयात किए जाते हैं। फिर तो हमे सोचना होगा कि हमारी अर्थ व्यवस्था स्वतंत्र न होकर पूरी तरह से परतंत्र है। हम आगे उतना ही जा सकते हैं जितना जाने के लिए रोज रास्ता बनाएं। आवश्यक है कि देश और देश हित सर्वोपरि हो और श्रमेव जयते का नारा हम बुलंद करते रहें।

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