.ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया!
- सत्येंद्र प्रकाश तिवारी
ज्ञानपुर, भदोही।
वाह फक्कड़ कबीर ने क्या बात लिखी है। इन पंक्तियों को पढ़ते ही जिंदगी खुद-ब-खुद गुनने लगती है। जी हां! यकीन न हो तो अपने जीवन के पन्ने पलट कर तो देखिए आप भी मान जाएंगे।
दरअसल, हर व्यक्ति की जिंदगी एक किताब है। एक किताब जो जन्म और मृत्यु के जिल्दों में मढ़ी है। इस किताब के पृष्ठ निश्चित हैं। इस किताब के पन्ने न आप फाड़ सकते हैं और न नये पन्ने जोड़ सकते हैं। इस किताब के पन्ने का एक पृष्ठ दिन है तो दूसरा रात। ये पन्ने रोज पलट रहे हैं। जन्म का जिल्द हर दिन पीछे छूटता जा रहा है तो मृत्यु का जिल्द हर पलटते पन्ने के साथ करीब आ रहा है।
इस किताब का लेखक कोई ईश्वर नहीं आप ही हैं। हाँ ! बिलकुल सही सुना, आपने ही लिखी है यह किताब अपने कर्मों की स्याही से, लेकिन अब यह किताब इश्वरीय प्रेस से प्रकाशित हो चुकी है। इस किताब की कापी राइट अब आपके पास नहीं वरन इसके प्रकाशक ईश्वर के पास है। आप विवश हैं इस किताब को पढ़ने के लिये। प्रत्येक पृष्ठ की प्रत्येक पंक्ति, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक अक्षर आपको पढ़ने ही हैं। ऐसी अनगिनत किताबें लिखी हैं आपने। आपसे बड़ा लेखक और आपसे बड़ा पाठक कोई नहीं। किताब तो इस समय भी लिख रहे हैं आप लेकिन अगले जन्म के लिये। हम जो बोये हैं वही काटते हैं और जो बोयेंगे वही काटेंगे।
किसी ने ठीक ही कहा है ---
कोउ न काहु सुख दुख कर दाता, निज कृत कर्म भोग सब भ्राता।।
एक बात समझ लीजिए कि यह जन्म परिणाम है, पिछले जन्म का और कारण है अगले जन्म का। मुझे बस यहाँ इतना ही कहना है कि इस जन्म में तो अब कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि इस जन्म की किताब प्रकाशित जो हो चुकी है पर अगले जन्म की पुस्तक हम जरा सँभाल कर लिख सकते हैं। कोई ईश्वर नहीं आप ही अपनी किस्मत अपने हाथों से लिखते हैं---
इसीलिये तो फक्कड़ कबीर बोल पड़ते हैं -
झीनी झीनी बीनी चादरिया।
ये चादर सुर नर मुनि ओढ़े ओढ़ के मैली कीन्ही चादरिया।
दास कबीर जतन ते ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीन्ही चादरिया।।



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