महंगाई का खतरा


 इलमा अज़ीम 
यूं तो कोई भी जंग महंगाई को बढ़ाने का कारण बनती है। लेकिन मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, यह समस्या भीषण रूप लेती जा रही है। महंगाई के कारण घटती क्रय शक्ति, आवश्यक वस्तुओं की कमी और सरकारों द्वारा उसे वहन करने की शक्ति कम होने पर सामाजिक अशांति का भी खतरा बढ़ सकता है। 

युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई आवश्यक वस्तुओं की कमी और यदि उसके कारण सामाजिक अशांति फैलती है तो उसका सीधा सीधा खामियाजा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। सामान्यत: भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर युद्ध का असर नकारात्मक ही पड़ता है। सबसे पहले तेल की कीमतें बढऩे से विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन बढ़ जाता है और विदेशी मुद्रा भंडार कम हो जाते हैं। 

दूसरे, बढ़ते आयात बिल और संस्थागत निवेशकों द्वारा पूंजी के बहिर्गमन के कारण स्थानीय मुद्रा का अवमूल्यन हो जाता है। गौरतलब है कि युद्ध के पिछले लगभग तीन सप्ताह में रुपए का मूल्य डॉलर के मुकाबले लगभग 3.0 प्रतिशत घट चुका है, और यह प्रक्रिया लगातार जारी है। तीसरे मुद्रास्फीति से निजात दिलाने के लिए सरकारों को ऊर्जा, खाद्य पदार्थों और उर्वरकों पर अधिक सब्सिडी देनी पड़ती है या कर कम करने पड़ते हैं। 

ऐसे में सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता है जिसका सीधा असर दोबारा से मुद्रास्फीति पर पड़ता है जिसका खामियाजा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। युद्ध की विभीषिकाओं के चलते एक तरफ जान-माल का विध्वंस तो दूसरी ओर आम आदमी के लिए विकास दर में गिरावट, महंगाई, बेरोजगारी और खाद्य असुरक्षा विश्व के लिए किसी भी प्रकार से मंगलकारी नहीं हो सकती। विश्व के तमाम देशों को युद्ध की समाप्ति के लिए अपने प्रयास बढ़ाने होंगे।

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