स्वयंभू दूत को चाहिए शांति का नोबेल!


- ललिता जोशी
पुरस्कार व्यक्ति को उत्साहित करते हैं या यूं कहें कि वो अच्छे काम के लिए प्रेरित करते हैं । पुरस्कार व्यक्ति को क्या जानवरों को भी प्रेरित करते हैं । जब कोई पालतू पशु अपने  पालक के लिए कुछ कर गुजरता है तो मालिक प्यार से उसे खाने को कुछ देता है और उसे दुलारता भी है । पालतू जानवर भी मालिक का दिल जीतने का प्रयत्न करते हैं । ऐसे ही बच्चे भी अपने अभिभावक और अध्यापकों का दिल जीतने के पढ़ाई और खेलों या अन्य एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी में अच्छा प्रदर्शन करने का प्रयास करते हैं।

 पुरस्कार की इच्छा तो सभी को रहती है। मगर हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता कि उसे पुरस्कार मिल सके । ये कोई कबीर, तुलसी या व्यास का युग थोड़े ही है। उन्होंने जो कुछ लिखा वो अमर हो गया । इनमें से किसी को औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी । इन सभी की लेखनी आज भी जनमानस में लोकप्रिय है। विद्यार्थी इन पर शोधपत्र लिखते हैं। ऐसे ही कुछ राजा और नेता जन कल्याण के लिए कार्य करते थे और ये अभी तक लोगों की स्मृतियों में कायम हैं ।
किसी जमाने में कुछ ही गिने चुने पुरस्कार होते थे। नोबल, मेगसेसे, पुलिट्ज़र, ऑस्कर जैसे अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार। अपने देश में भारत रत्न, साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञान पीठ पुरस्कार इत्यादि -इत्यादि । चाहे वैज्ञानिक हों या रचनाकार हों या फिर खिलाड़ी हों या सैनिक या अध्यापक फिर किसी अन्य प्रॉफ़ेशन के हो सभी क्षेत्रों में सरकार पुरस्कार प्रदान करती हैं । ये जरूरी भी है ताकि मोटिवेशन बना रहे और सभी अपने -अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर देश और समाज को लाभान्वित कर सकें।
 
आजकल तो पुरस्कारों की दौड़ में सभी शामिल होते हैं लेकिन कुछ ही भाग्यशाली लोग होते हैं जिन्हें उनकी पात्रता और कार्य के लिए पुरस्कार मिलता है । नोबल शांति पुरस्कार के लिए एक राष्ट्राध्यक्ष ने बहुत जतन किए। ये दावा भी किया जहां पर भी पड़ोसी देश आपस में गुथ्मगुथा करते हैं।  वहाँ -वहाँ वो शांति बहाल करा देते हैं। चाहे भारत और पाकिस्तान हो या फिर अफगानिस्तान और पाकिस्तान हो या यूक्रेन और रूस का मामला हो । ये बाउजी ट्र्म्प के नाम से मशहूर हैं । अब पश्चिम एशिया में आग लगा कर ये महाशय सोच रहे थे कि इसे काबू भी कर लेंगे। जनाब जब आग तेल में लगी हो तो उसे नियंत्रित करना दुष्कर हो जाता है । आग की तपन तो झुलसा कर रख देती है । जब ये आग उग्र हो जाती है तो जला कर राख़ कर डालती है ।
ट्रम्प बाउजी को सिर से पैर तक इस आग ने झुलसा कर रख दिया है । ये तो वही बात हो गई कि जब दूध गरम है पीने के लिए मुंह में भरो तो मुंह जलता है थूको तो दूध है। इस युद्ध के सूत्रधार ने ऐसा युद्ध छेड़ा कि अब खुद ही छिड़ चुके हैं। अपने देश  में देशव्यापी विरोध और प्रदर्शनों का सामना कर पड़ना रहा है । जिसे प्रचंड बहुमत से जीत मिली अब जनता उससे युद्ध का औचित्य जानना चाह रही है । चुनाव प्रचार में उनका साथी जो उनके कैबिनेट में महत्वपूर्ण पद पर था वो भी उनका साथ छोड़ गया । क्या हुआ ये । तब तो ये दोनों ही ये गीत गा रहे थे “ये दोस्ती हम नही छोड़ेंगे “। क्या से क्या हो गया ? ये ट्रम्प बाउजी ।
ये स्वयंभू शांति दूत जहां तेल की धार देखते हैं वहीं फिसल जाते हैं और फिर ये नादान से शैतान बन जाते हैं। हथियारों के दम पर ईरान को अपने चरणों से रौंदना शांतिदूत को शोभा नहीं देता। ख्वाब नोबल शांति पुरस्कार का। ये वही बात हुई की बिल्ली के ख्वाब में छिछड़े ही छिछड़े । अब तो बाउजी खुल कर सबके सामने आ गए और ये भी कह दिया की इनका तेल मैं अपने नियंत्रण में लेना चाहता हूँ। इसके लिए अब नभ, जल के साथ थल से आक्रमण करने की तैयारी कर रहे हैं । ईश्वर ही जाने ये कितने सफल हो पाते हैं ।
ये ना तो खुद ही शांत हैं न ही कहीं शांति रहने देते हैं । तेल के खेल में इनका खुद का खेला हो चुका है। तेल तो चलो कुछ समझ में भी आता है । ये दूसरे देशों के साथ टेरीफ़ युद्ध में भी लगे रहे । कहीं पैसे का लालच कहीं पर तेल का तो उससे भी ज्यादा पुरस्कार का वो भी नोबल शांति पुरस्कार । न नोबल हैं ये न ही शांत । इनकी हालत पर गालिब का एक शेर याद आ गया :
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल -ए-यार होता ,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता ।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)

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