क्या पृथ्वी 100 अरब लोगों को सहन कर सकती है
विवि के अटल सभागार में राष्ट्रीय कान्फ्रेस का आयोजन
मेरठ ।तीन दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन दी 37 वी ऑल इंडिया कांग्रेस ऑफ जूलॉजी एंड इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन एडवांस इन साइंटिफिक रिसर्च ऑफ मेन एंड हिज लाइवस्टॉक न्यूट्रीशनल सिक्योरिटी एंड सस्टेनेबल फ्यूचर - 2026 के द्वितीय दिवस पर अटल सभागार में आयोजन किया गया। इस अवसर पर देशभर से आए वैज्ञानिकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
कार्यक्रम के अंतर्गत समानांतर रूप से तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रथम सत्र मुख्य कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित हुआ, जिसमें मत्स्य, मत्स्यिकी एवं जलीय कृषि प्रबंधन विषय पर चर्चा की गई। द्वितीय सत्र राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित किया गया, जिसमें पर्यावरणीय विष विज्ञान एवं जलवायु परिवर्तन से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। तृतीय सत्र सेमिनार हॉल, फार्मेसी विभाग में आयोजित हुआ, जिसमें कार्यात्मक जीवविज्ञान पर विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
इन सत्रों में कई प्रतिष्ठित विद्वानों ने आमंत्रित व्याख्यान दिए, जिनमें प्रमुख रूप से प्रो. बी. एन. पाण्डेय, प्रो. बी. डी. जोशी, प्रो. सीमा लांगर, प्रो. एस. पी. त्रिवेदी, प्रो. आनंद शर्मा, प्रो. शिवेश पी. सिंह, प्रो. जदाब कृष्ण बिस्वास, प्रो. माधवी, प्रो. रंजीवाय सिंह, प्रो. रजनीकांत मिश्रा एवं डॉ. शिवानी पाण्डेय शामिल रहे।
प्रथम सत्र मुख्य कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित हुआ, जिसमें मत्स्य, मत्स्यिकी एवं जलीय कृषि प्रबंधन विषय पर चर्चा की गई। इस सम्मेलन का मुख्य विषय “मानव एवं उसके पशुधन के स्वास्थ्य एवं कल्याण हेतु वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रगति: पोषण सुरक्षा एवं सतत भविष्य” रखा गया है। इस महत्वपूर्ण आयोजन में देश-विदेश के वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों एवं शोधार्थियों की सक्रिय सहभागिता देखने को मिल रही है।
सम्मेलन के दौरान विभिन्न प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों द्वारा आमंत्रित व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। प्रो. बी. एन. पाण्डेय ने “पृथ्वी पर 100 बिलियन जनसंख्या के संभावित प्रभाव एवं सतत भविष्य” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए बढ़ती जनसंख्या से उत्पन्न चुनौतियों और उनके समाधान पर प्रकाश डाला।
प्रो. बी एन पांडे ने अपने संबोधन में पृथ्वी की वहन क्षमता और बढ़ती जनसंख्या के प्रभावों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि यह प्रश्न कि क्या पृथ्वी 100 अरब लोगों को सहन कर सकती है, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के बीच लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पृथ्वी की अधिकतम सतत जनसंख्या लगभग 8–12 अरब के बीच मानी जाती है। कुछ शोध यह भी संकेत देते हैं कि उन्नत तकनीक और सतत संसाधन प्रबंधन के माध्यम से यह संख्या 20–30 अरब तक बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों में 100 अरब की जनसंख्या पृथ्वी के संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डालेगी।
इसी क्रम में प्रो. बी. के. चक्रवर्ती ने “मानव पोषण सुरक्षा हेतु अनुसंधान में प्रगति एवं मत्स्य एवं जलीय कृषि के सतत विकास” विषय पर व्याख्यान देते हुए पोषण सुरक्षा में एक्वाकल्चर एवं मत्स्य पालन की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मत्स्य पालन कई प्राकृतिक और मानव जनित चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनमें अत्यधिक दोहन , जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ, पर्यावरण प्रदूषण, औद्योगीकरण तथा विनाशकारी मत्स्य पकड़ने के उपकरणों का उपयोग प्रमुख हैं। इसके अलावा कीटनाशकों और कृषि रसायनों का उपयोग भी जलीय संसाधनों को प्रभावित करता है।
प्रो. फैयाज़ अहमद ने “कश्मीर में परजीवी विज्ञान अनुसंधान में प्रगति: वर्तमान प्रवृत्तियाँ एवं भविष्य की संभावनाएँ” विषय पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए तथा इस क्षेत्र में हो रहे नवीनतम अनुसंधानों की जानकारी दी।
वहीं प्रो. सुमेन मिश्रा ने “माइक्रोस्पोरिडिया एवं क्रॉस-किंगडम परजीविता: पारिस्थितिकी, मानव स्वास्थ्य एवं ‘वन हेल्थ’ पर प्रभाव” विषय पर व्याख्यान देते हुए परजीवियों के व्यापक प्रभावों पर विस्तृत चर्चा की।कार्यक्रम में प्रोफेसर सुमन मिश्रा ने अपने व्याख्यान में जैविक अनुसंधान और आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आणविक जीवविज्ञान एवं उन्नत विश्लेषणात्मक तकनीकों के माध्यम से जैव विविधता तथा रोगजनकों के अध्ययन में महत्वपूर्ण प्रगति हो रही है। उनके व्याख्यान ने शोधार्थियों को नवीन शोध दिशाओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की।
सम्मेलन के दौरान विभिन्न तकनीकी सत्रों, शोध प्रस्तुतियों एवं विचार-विमर्श के माध्यम से वैज्ञानिक ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला। यह सम्मेलन न केवल शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हो रहा है, बल्कि सतत विकास एवं मानव कल्याण के लिए नई दिशा भी प्रदान कर रहा है।
इसके अतिरिक्त, प्रो. सीमा लांगर ने “जम्मू के जल संसाधनों के पोषणीय स्वर्ण भंडार: मीठे पानी के शेलफिश की विविधता एवं संभावनाएँ” विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने पोषण सुरक्षा एवं जैव विविधता के संदर्भ में मीठे पानी के शेलफिश के महत्व को रेखांकित किया। व्याख्यान के दौरान उन्होंने जलीय जीवों, विशेषकर क्रस्टेशियन और मछलियों में पाए जाने वाले पोषण तत्वों, जैव सक्रिय यौगिकों तथा एंटीऑक्सीडेंट गुणों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इन जीवों में उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन और आवश्यक खनिज पाए जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। सीमा लेंगर ने अपने व्याख्यान में यह भी बताया कि विभिन्न प्रजातियों में पोषक तत्वों की संरचना में मौसमी परिवर्तन देखे जा सकते हैं। इस प्रकार के अध्ययन जलीय संसाधनों के संरक्षण, सतत उपयोग और मानव उपभोग के लिए उनकी उपयुक्तता के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चाय अवकाश के पश्चात सत्रों का पुनः संचालन किया गया, जिसमें विभिन्न विषयों पर चर्चा को आगे बढ़ाया गया। साथ ही युवा शोधकर्ताओं द्वारा ओरल प्रेजेंटेशन के माध्यम से अपने शोध कार्य प्रस्तुत किए गए, जिससे ज्ञान-विनिमय को प्रोत्साहन मिला।
इसी क्रम में प्रोफेसर रजनीकांत मिश्रा ने पर्यावरणीय स्थिरता, जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन तथा पारिस्थितिक प्रभावों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन रणनीतियाँ आज के समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता हैं तथा इसके लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
सम्मेलन के दौरान प्रोफेसर एम. माधवी ने भी अपना आमंत्रित व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने जैव रसायन एवं आणविक जीवविज्ञान से संबंधित नवीन शोध एवं तकनीकों पर प्रकाश डाला। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान में आधुनिक उपकरणों और विधियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए विद्यार्थियों और शोधार्थियों को नवाचार की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
सम्मेलन का द्वितीय दिवस सफलतापूर्वक संपन्न हुआ तथा यह प्रतिभागियों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी सिद्ध हुआ।
संगोष्ठी में हेड जंतु विभाग बिंदु शर्मा, Emeritus prof. S.S. LAL, H. S. SINGH, Prof. A.K. Chaubey, PROF. S.K. Bhardwaj, Prof. Neelu jain gupta, Dr. D.K. Chauhan, Dr. Anshu Chaudhary आदि उपस्थित रहे।


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