महिलाओं की सुरक्षित सहभागिता का समय

- संध्या अग्रवाल
हर वर्ष महिला दिवस पर सम्मान और सशक्तिकरण की बातें ज़ोर-शोर से होती हैं। पर क्या सचमुच महिलाओं का दैनिक जीवन उतना ही सुरक्षित और सम्मानजनक है, जितना मंचों से बताया जाता है? यही वह प्रश्न है, जो उत्सव के बीच भी हमें ठहरकर सोचने को मजबूर करता है।
हर वर्ष महिला दिवस आते ही सम्मान, अधिकार और सशक्तिकरण की चर्चाएँ तेज़ हो जाती हैं। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं और उपलब्धियों के उदाहरण गिनाए जाते हैं। लेकिन असली प्रश्न आज भी वही है — क्या महिलाओं का रोज़मर्रा का जीवन उतना ही सुरक्षित, सम्मानपूर्ण और अवसरपूर्ण बन पाया है, जितना इन मंचों पर दिखाई देता है? आधी आबादी की वास्तविक और सुरक्षित सहभागिता के बिना किसी भी समाज का संतुलित विकास संभव नहीं।

निस्संदेह पिछले वर्षों में शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और उद्यमिता के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। छोटे शहरों और कस्बों की बेटियाँ अब सीमाएँ तोड़कर अपनी पहचान बना रही हैं। स्वयं सहायता समूहों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकारी योजनाओं ने आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में नए रास्ते खोले हैं। यह परिवर्तन समाज में सकारात्मक चेतना का संकेत है।

फिर भी चुनौती केवल अवसर उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि सामाजिक सोच बदलने की है। आज भी अनेक परिवारों में लड़की की शिक्षा को निवेश नहीं बल्कि खर्च माना जाता है। कार्यस्थलों पर सुरक्षा, समान अवसर और निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी जैसे प्रश्न पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में तो कई प्रतिभाएँ सामाजिक दबाव और असुरक्षा की भावना के कारण आगे बढ़ने से पहले ही रुक जाती हैं।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल नौकरी या आय नहीं, बल्कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता, आत्मविश्वास, सुरक्षा और सम्मानपूर्ण वातावरण है। जब घर में बेटी की राय सुनी जाएगी, स्कूल में उसे बराबरी का मंच मिलेगा और समाज उसकी उपलब्धियों को सहज रूप से स्वीकार करेगा, तभी वास्तविक परिवर्तन दिखाई देगा।

इस दिशा में शिक्षा सबसे बड़ा माध्यम है। केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि जीवन कौशल, डिजिटल साक्षरता और आत्मरक्षा प्रशिक्षण भी उतने ही आवश्यक हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि रहे, और उसी के साथ उन्हें अवसर तथा विश्वास भी मिले। सुरक्षित वातावरण ही उन्हें आगे बढ़ने का वास्तविक आत्मबल देता है।


महिला दिवस को केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय इसे सामाजिक आत्ममंथन का अवसर बनाया जाना चाहिए। यदि परिवार, संस्थाएँ और समाज मिलकर सुरक्षा, समान अवसर और सम्मान की संस्कृति विकसित करें, तो सशक्तिकरण किसी विशेष दिन का विषय नहीं रहेगा, बल्कि सामान्य जीवन व्यवहार बन जाएगा।
महिलाओं की प्रगति केवल उनका अधिकार नहीं, समाज की आवश्यकता है।
जब सुरक्षा, अवसर और विश्वास साथ चलेंगे, तभी सशक्तिकरण सचमुच जीवन में उतरेगा।
(लेखिका, जबलपुर)

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