...तो बदल रही है नीर भरी दुख की बदली!  

- ललिता जोशी
मार्च यानि महिला सशक्तिकरण का माह । सम्पूर्ण विश्व में 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है । महिलाओं की आबादी को आधी आबादी भी कहा जाता है । महिला दिवस का उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों का सम्मान करना है इससे पर ज़ोर-शोर से कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं । इन सबसे बड़ा उद्देश्य है लैंगिक समानता को बढ़ावा देना। अपने देश में महिलाओं को लैंगिक समानता तो वैदिक  युग से ही प्राप्त है । अपने यहाँ तो कन्याओं को पढ़ाई -लिखाई का अधिकार था । इतना ही इन्हें हवन करने का भी अधिकार था । इसके साथ ही अपने लिए वर के चयन की स्वतन्त्रता थी ।
अपने देश की महिलाएं हमेशा से अपनी सक्रिय भूमिका के लिए जानी जाती रहीं हैं । चाहे शक्ति प्रदर्शन हो या भक्ति का । स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं ने जबर्दस्त भूमिका निभाई थी । आज भी महिलाएँ जनसरोकारों में सशक्त भूमिका निभा रही हैं । महिलाओं ने जब -जब मैं नीर भरी बदली के अपने रूप को छोड़ा है या छोड़ना चाहा उसे बहुत सी आलोचनाओं को झेलना पड़ा । अपनी सनातन परंपरा में महिलाओं को पहले से ही स्वतन्त्रता मिली हुई थी । आज हालत ये है की सरकार मैं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की योजना चलाने के लिए विवश है । आज चाहे महिलाएं आकाश में पहुंच गई हो या फिर ऑपरेशन सिंदूर में अपना लोहा मनवा चुकी हों फिर भी उनकी सुरक्षा के लिए घर से लेकर बाहर तक सभी को चिंता रहती है ।  अभी हाल ही में एक कमांडो महिला की हत्या उसके पति ने कर दी । जब महिलाएं अपने करियर की सफलता का परचम लहरा रही होती हैं तो अभिभावकों और परिजनों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
इतना सब कुछ होने पर भी सरकार कमजोर वर्ग की बालिकाओं और महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए कटिबद्ध है । महिलाएं इससे लाभान्वित भी हो रही हैं ।
महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार अपने -अपने स्तर पर अनेक योजनाएँ बनाकर उन्हें क्रियान्वित करती है । इसमें वित्तीय सहायता से लेकर कई कल्याणकारी योजनाएँ हैं । महिला उद्धमियों के लिए बैंक ऋण उपलब्ध करवाते हैं । सरकार की लखपति दीदी योजना महिला उद्धमियों में अत्यंत ही लोकप्रिय है । इससे महिलाएं वित्तीय स्वतन्त्रता की ओर मजबूती से अपने कदम बढ़ा रहीं हैं । बावजूद इसके अभी भी महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं । वर्ष 2024 राष्ट्रीय महिला आयोग को महिलाओं के खिलाफ अपराधों की 25743 शिकायतें मिली । घरेलू हिंसा के मामले 6237 (24%)और दहेज उत्पीड़न 4,383(17%) रहे ।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार भारत में 2022 में कार्यस्थलों पीआर यौन उत्पीड़न के 419 से अधिक मामले दर्ज किए गए । नेस्कॉम और जेनपक्ट के 2024 के अध्ययन ने बताया शहरी भारत में 38%कामकाजी महिलाओं ने उत्पीड़न का अनुभव किया । कार्यस्थल पर उत्पीड़न की शिकायतों को सुरक्षित रूप और आसानी से दर्ज करने के लिए “शी -बॉक्स”पोर्टल लॉन्च किया । महिलाओं के लिए इतनी योजनाएँ लागू करने के बाद भी महिलाओं के प्रति अपराधों में रोक नहीं लग पा रही है । ये अपराध 8 माह से 80 आयु वर्ग की बच्चियों से लेकर महिलाएं के साथ होते हैं । आज भी मी टू के कई कांड हम सभी के समक्ष आते  रहते हैं ।

महिला दिवस की सफलता तभी होगी जब एक महिला मजदूर को भी सुरक्षा मिले । इसके साथ ही पुरुषों की मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है कि महिला चाहे माँ बहन या पत्नी हो, उसे सम्मान दिया जाना चाहिए । किताबों में तो यत्र पूज्यन्ते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता को जपते रहो और असल में उसे उत्पीड़ित करो तो क्या मायने है महिला दिवस को मनाने का । महिला दिवस कि सार्थकता तो तब होगी जब महिलाएं रात -बेरात बेखौफ होकर घूम सकें ।  हरीशंकर परसाई के अनुसार ,”दिवस (विशेष दिन ) कमजोरों के ही मनाए जाते हैं जैसे मजदूर दिवस ,महिला दिवस और शिक्षक दिवस ।
महिलाओं को मैं नीर भरी दुख की बदली की मानसिकता से बाहर निकल कर अपने अस्तित्व और उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए । महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा प्रत्येक क्षेत्र में मनवा लिया है । महिलाओं को महिला दिवस मना कर इतिश्री नहीं करनी चाहिए । महिलाओं को 365 दिन ही अपनी उपलब्धियों को मनाना चाहिए । नहीं तो वही कहावत हो जाएगी चार दिन की चाँदनी और फिर अंधेरी रात।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)

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