सराहनीय कदम
इलमा अज़ीम
कर्नाटक ने सोलह साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के घातक प्रभावों से बचाने के लिये देश में सबसे पहले सराहनीय पहल की है। यह निर्णय अभिभावकों की उस चिंता को कम करता है जो अनियंत्रित डिजिटल गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले जोखिम से परेशान थे। कर्नाटक की पहल के बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी घोषणा की है कि अगले नब्बे दिनों के भीतर 13 साल से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगा दी जाएगी।
उल्लेखनीय है कि ऐसी पहल पहले आस्ट्रेलिया और फ्रांस आदि देशों में हो चुकी है। हालांकि, इन राज्यों की पहल सराहनीय है, लेकिन इस प्रतिबंध का प्रभावी क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित होगा, इसका प्रारूप अभी स्पष्ट नहीं है। दरअसल, देश-दुनिया के मनोवैज्ञानिक और बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग किशोरों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
यहां सवाल उठता है कि इस कार्य योजना को अमलीजामा कैसे पहनाया जाएगा? यह हकीकत जानते हुए कि आज के डिजिटल युग में, स्मार्टफोन और ऐप्स शिक्षा, संचार और दैनिक जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं। यहां उल्लेखनीय है कि तमाम स्कूल असाइनमेंट और अपडेट के लिये मैसेजिंग एप्स, ऑनलाइन पोर्टल और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता बढ़ गई है। यही वजह है कि छात्रों द्वारा ‘शैक्षिक’ और ‘सामाजिक’ उपयोग के बीच अंतर करना मुश्किल साबित हो सकता है।
वहीं चिंता की बात यह भी कि किशोरों की आयु का सत्यापन कैसे व्यावहारिक बनाया जा सकेगा। वहीं देखना होगा कि सोशल मीडिया को संचालित करने वाली तकनीकी कंपनियां किस हद तक इस दिशा में सहयोग करेंगी। सहयोग न मिलने पर प्रतिबंध की व्यावहारिकता पर सवालिया निशान लग सकते हैं। हालांकि, किशोरों को सोशल मीडिया की विकृतियों से बचाने के लिये तात्कालिक पहल केंद्र सरकार की तरफ से की जाती तो उसका देशव्यापी प्रभाव होता। लेकिन इसके बावजूद यदि कर्नाटक व आंध्र प्रदेश ने इस दिशा में पहल की है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य राज्य भी इससे प्रेरणा ले सकेंगे।





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