तनावमुक्त हों छात्र
राजीव त्यागी
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी बहुआयामी दबाव से गुजर रहे हैं। परीक्षा में बेहतर अंक लाने की होड़, अभिभावकों की अपेक्षाएं, प्रतिस्पर्धा का माहौल और भविष्य की चिंता- ये सभी कारण विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में पढ़ाई की एक बड़ी व्यावहारिक समस्या है- विषयों के बीच समय का असंतुलन। कुछ विषयों को अधिक समय देना और कुछ को लगातार टालते रहना तनाव बढ़ाने का प्रमुख कारण बन चुका है।
विद्यार्थियों को संतुलित पढ़ाई की आदत डालने में अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल अंकों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, विषयों की समझ और निरंतर प्रयास को महत्व देना चाहिए। आज के समय में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मनोरंजन भी पढ़ाई के संतुलन को बिगाड़ते हैं। विद्यार्थी कई बार समय का सही आकलन नहीं कर पाते। ऐसे में स्वयं अनुशासन और समय प्रबंधन की शिक्षा पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है।
आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को डर और दबाव से मुक्त कर, उसे संतुलन, समझ और आत्मविश्वास से जोड़ा जाए। तनावमुक्त विद्यार्थी ही सशक्त समाज और उज्ज्वल भविष्य की नींव रखते हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के घोषित लक्ष्य, जो कि उच्च शिक्षा के माध्यम से मानव की पूर्ण क्षमता को विकसित करते हुए एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में उसकी राष्ट्र की प्रगति में भूमिका सुनिश्चित करना है।
इसे ध्यान में रखते हुए हमें सीखने की प्रक्रिया में बदलाव कर वर्तमान समय की मांग के अनुरूप नए दृष्टिकोण को अपनाने की जरूरत है। व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि अगर समय रहते बदलाव नहीं किए गए तो भारत में एक ऐसा संकट खड़ा हो सकता है जहां डिग्रियों की संख्या तो बहुत होगी, लेकिन रोजगार के अवसर कम होंगे। यह असंतुलन न सिर्फ छात्रों के भविष्य को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर डालेगा।





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