संतुलन ही भारत का भविष्य है
- प्रो. नंदलाल
विकास एक आवश्यक प्रक्रिया है। आज का भारत बहुत बदल चुका है।अपने विकास की यात्रा को मापता हुआ भारत एक अच्छी गति से आगे बढ़ रहा है और भविष्य भी भारत का है। इसमें कोई आशंका नहीं है।क्योंकि भारत एक आस्तिक देश है और यहां के लोग धर्म और आस्था में भरोसा रखते हैं।हिंदुस्तानी संस्कृति भी वसुधैव कुटुम्बकम को अपना मूल मंत्र मानती है। सर्वे भवन्तु सुखिन यहां का ध्येय वाक्य है। लोगों के अंदर यह बात कूट कूट कर भरी है कि अच्छे कार्य करो,किसी के बारे में बुरा मत सोचो,जियो और जीने दो। अनावश्यक रूप से आधिपत्य या विस्तारवादी नीति को त्यागो।
आज की दुनिया बदल गई है। बर्चस्व की लड़ाई चारों तरफ छिड़ी हुई है।ऐसे में भारतवर्ष को आगे बढ़ना है। हथियारों की होड़ संसाधनों पर कब्जा, अपने लिए हर सुविधाओं का भंडारण,एकमात्र लक्ष्य है। आज मानव ऐसे ऐसे हथियार तैयार कर बैठा है जो पलक झपकते ही आधी दुनिया को चंद मिनटों में तबाह कर सकता है। ऐसे ऐसे तानाशाह और झक्की शासक विश्व में पदस्थ हैं जो अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे में अपने देश की सुरक्षा भी एक बड़ी जिम्मेदारी है। सुरक्षा के लिए ही सही कुछ न्यूनतम सुरक्षा कवच तो बनाने ही होंगे अन्यथा ये तानाशाह अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए मनोरंजन के रूप में एक छोटा मोटा युद्ध थोप देते हैं और कभी कभी ये उस मनोरंजन में उलझ भी जाते हैं।किस स्वार्थ की पूर्ति में अमेरिका इजराइल ने ईरान पर हमला किया और बिना बताए चंद मिनटों में अयातुल्ला खामनई को मार डाला।इस पर दुनिया अपना विवेचन कर रही है और करेगी पर पूरा विश्व इस समय तमाम तरह की कठिनाइयों से गुजर रहा है।
कहीं रसोई गैस की किल्लत तो कही पेट्रोल डीजल की समस्या तो कही फर्टिलाइजर की समस्या अनावश्यक रूप से सिर्फ अपने अहम को साधने के लिए पैदा कर दिया गया है। पूरा विश्व अशांत है क्या होगा कोई नहीं जानता। कोशिशें हो रही हैं पर दिशा का पता नहीं क्या होगा। नाटो की प्रासंगिकता संदिग्ध है। ट्रंप के उकसावे के बाद भी सदस्य देश हिम्मत नहीं कर पा रहे कि उन्हें क्या करना चाहिए। युद्ध ही एकमात्र रास्ता नहीं था।
जब युद्ध शुरू हुआ और खामनेई को मार डाला गया तो भारतवर्ष के लोग इस पर सरकार की प्रतिक्रिया जानना चाह रहे थे। ऐसे मोड पर प्रतिक्रिया देना आसान नहीं होता और बिना सोचे समझे प्रतिक्रिया देना भी नहीं चाहिए। क्योंकि ग्लोबल हो चली दुनिया में अब अलग थलग रहा भी नहीं जा सकता। सभी देश एक दूसरे की जरूरतों और उनकी ग्लोबल आपूर्ति पर आश्रित हो गए हैं। इस ग्लोबल दुनिया में अपने अस्तित्व को बनाए रखना और अपने विकास को मेंटेन करना ये दोनों ही लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय मापदंडों पर ही आश्रित है। सभी देशों की निर्भरता एक दूसरे पर आश्रित हो गई है। ऐसे वक्त में या तो दुनिया अपनी जरूरतों के हिसाब से अलग अलग क्षेत्र बनाएं या भूमंडलीकरण के नियमों के अंतर्गत रहे।
आज की स्थितियां जटिल हो गई हैं। समृद्ध राष्ट्र ग्लोबल होते हुए भी आसानी से नियमों की अवहेलना करते रहते हैं क्योंकि वे समर्थ है और जो समर्थ होता है वह कोई भी गुनाह कर दे उसे गुनाह नहीं माना जाता।नियम तो कमजोर लोगों के लिए बनाए जाते हैं। इतिहास चाहे जो भी रहा हो कभी ईरान का दोस्त रहा अमेरिका आज इजराइल के साथ ईरान को बर्बाद कर चुका है पर दुनिया तो आज इजराइल की हवस को भुगत रही है। भारतवर्ष में भी गैस, खाद और पेट्रोलियम को लेकर दुविधा का माहौल बना हुआ है।पेट्रोल पंपों पर,रसोई गैस की बुकिंग पर लाइन लगी हुई है।महंगाई रिकॉर्ड तोड़ने पर आमादा है। प्रधानमंत्री का संसद में दिया गया बयान कि आने वाला समय परीक्षा की घड़ी है। हमें इस संकट में एक होना है और एक टीम के रूप में आने वाले समय का सामना करना है।
ऐसे समय में भारत की कूटनीति संयमित है और ऐसे वक्त पर संतुलित प्रतिक्रिया की ही जरूरत है। वक्त बदलता रहता है, स्थितियां प्रतिकूल हैं पर नियंत्रण में भी नहीं है क्योंकि एक पक्ष अपनी इगो को साधने में लगा है और दूसरा पक्ष कुछ भी करने को आमादा है। ईरान बर्बाद हो चुका है लेकिन पूरी शिद्दत से लड़ रहा है क्योंकि वास्तव में उस पर युद्ध थोपा गया है। उसे अपने अस्तित्व को बचाने से बहुत से देशों की आर्थिक स्थिति गड़बड़ होती जा रही है। ऐसे में दुनिया के देशों को कोई रास्ता निकालना चाहिए और विश्व में उत्पन्न हालातों को संभालने का प्रयास करना चाहिए पर यूक्रेन की मदद रूस को खल रही है और चीन तथा भारत जैसे बड़े देशों की बिगड़ती स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। यदि यह युद्ध नहीं सम्हल पाया तो ईरान अकेले युद्ध में नहीं होगा और इजराइल को इसका गंभीर खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
हमें हर हाल में संयमित रहना ही होगा और भारत की मूल भावना और सांस्कृतिक अस्मिता के साथ सूक्ष्म तथा पैनी नजर रखना होगा ताकि हमारा भविष्य जोखिम में न चला जाय क्योंकि हम मूलतः व्यापारी नहीं हैं और हमारी पूंजी हमारी सांस्कृतिक धरोहर और भारत की आत्मा है जो सर्वे भवन्तु सुखिनः पर टिकी है।इसी के साथ भविष्य में हम प्रगति कर सकते हैं और आने वाले समय में वही टिक पाएगा जो सर्व भूत हित रतः में विश्वास रखता हो। उम्मीद है भारत इस कठिन समय को भी पार कर लेगा। धैर्य की जरूरत है और भारतीयों को अधिक उद्विग्न होने की जरूरत नहीं है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)





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