- डॉ. नंदलाल
लोग कहते हैं कि सोशल मीडिया पर परोसी जा रही सूचनाएं लगभग भ्रामक होती हैं। ऐसा है भी। अधिकांश सूचनाएं या तो मनोरंजन के लिए होती हैं या विज्ञापनों के लिए या स्वतः की कुछ आय बढ़ाने का एक जरिया होती हैं। विभूक्षी तम किन न करोती पापम। भूखा आदमी हर तरह का पाप करता है। सोशल मीडिया में कोई कुछ भी दे सकता है। मै स्वयं सोशल मीडिया के विज्ञापनों से ठगा जा चुका हूं। इसलिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि हर तरह के उपक्रम सोशल मीडिया पर चलाये जाते हैं। लेकिन एक पक्ष मै देख रहा हूं कि सोशल मीडिया के जितने भी न्यूज चैनल हैं वे दिन प्रतिदिन अपनी विश्वसनीयता में वृद्धि कर रहे हैं। राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स ने न्यूज देने का जो तरीका खोज निकाला है उससे श्रोता और दर्शक दोनों परेशान हो चुके हैं।
अब लोगों के घरों में टीवी सिर्फ बच्चे देखते हैं या वे देखते हैं जिनको टाइम पास करना होता है। बच्चे एक मोटा हाथी घूमने चला या आलू कचालू बेटा कहां गये थे, इसी को चलाकर दिन भर उस में मस्त रहते हैं। राष्ट्रीय चैनलों की टीआरपी चाहें जितनी बढ़ रही हो या घट रही हो,अब उनको देखने वाले सिमटते जा रहे हैं या दिन भर चैनल बदलते रहते हैं। यहां यह न समझा जाय कि यह कोई व्यक्तिगत अनुभूति है यह सार्वजनिक एकत्र अनुभव है। पत्रकारिता या समाचार प्रेषण एक समीक्षात्मक कला होती है और पत्रकारों एवं एंकरों को यही पढ़ाया भी जाता है पर कुछ एंकर जब उसमें मिर्च मसाला का तड़का लगाकर उसे परोसना चाहते हैं तो कुछ का तो स्वादिष्ट हो जाता है पर कुछ का व्यंजन लोगों का हाजमा खराब कर देता है।राष्ट्रीय चैनल्स पर प्रसारित होने वाले समाचारों का नाटकीकरण तेजी से बढ़ रहा है। लगता नहीं है कि ये न्यूज एंकर हैं। ऐसे लगता है कि न्यूज चैनल्स पर कोई नाटक या मनोरंजन का कोई सूत्रधार बोल रहा है पहले लोग दूरदर्शन पर भरपेट समाचार सुना करते थे और उसकी समीक्षा किया करते थे।
राष्ट्रीय चैनलों पर जब पैनलिस्ट बुलाए जाते हैं और उनसे किसी मुद्दों पर चर्चा कराई जाती है, वैसे तो मुद्दों का चयन भी हास्यास्पद लगता है जो पूर्वाग्रहों से लबालब रहता है तो एंकर उसमें भी अपने पूर्वाग्रहों को उसमें बीच बीच में प्रदर्शित करते हैं। जिससे समाचारों और चर्चाओं को निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता । एंकर अपने सेट एजेंडे पर विभिन्न स्थानों और क्षेत्रों से बुलाये गये प्रवक्ताओं से बोलवाना चाहते हैं। चर्चा किसी सेट एजेंडे पर चलेगी तो वह कभी भी निष्पक्ष नहीं हो सकती आजादी चाहिए अपनी बात रखने की हां यह ध्यान रखना चाहिए कि विषयांतर न होने पाए, वैसे पॉलिटिकल एजेंडे पर चर्चा कभी कभी दूसरी दिशा में चले जाने से कोई विशेष क्षति की संभावना नहीं रहती। जब हम लोग राष्ट्रीय चैनल्स पर डिस्कशन सुनते हैं तो उसमें आये प्रवक्ता और उनके डिस्कशन का स्तर देखकर सिर पकड़ने के अलावा कुछ दिखता नहीं।
हर प्रवक्ता अपनी पार्टी और अपनी विचारधारा के प्रति इतना अधिक कोहेसिव हो जाता है कि उसे उचित और अनुचित दिखाई नहीं पड़ता और वे एक दूसरे को गाली गलौज करने पर आमादा हो जाते हैं। उनका एजेंडा उनके अमर्यादित व्यवहार के कारण कोसों दूर चला जाता है और एंकर की अपनी मनोकामना पूरी हुई दिखने लगती है। इस माहौल ने राष्ट्रीय चैनल्स के प्रत्यक्षीकरण को नीचे धकेल दिया है पर चैनल मालिक, संपादक और एंकर इसे सुधारने की जगह खुद पहलवान की तरह ताल ठोककर अखाड़े में कूद जाते हैं। खैर यह उनका अपना व्यवसाय है जो मर्जी चाहे करें पर उनकी विश्वसनीयता दिन प्रतिदिन कम हो रही है। उनके प्रस्तुतीकरण के कारण ही अधिकांश चैनल्स गोदी मीडिया की संज्ञा से विभूषित किये जा रहे हैं और ये खुश भी हो रहे हैं। इसी को तो पूर्वाग्रह कहते हैं।
रही बात सोशल मीडिया पर चल रहे न्यूज चैनलों की तो इनकी प्रस्तुति और विश्वसनीयता, प्रभावशीलता दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। एक तो ये चैनल जो न्यूज चलाते हैं उनमें नाटकीयता और रंगमंचीय प्रस्तुति नहीं होती। सीधा सपाट न्यूज दिखाया जाता है और जो पैनलिस्ट आते हैं वे बहुत अनुभवी, तजुर्बेकार एवं पुराने समय के मूल्यवान पत्रकार होते हैं। वे वास्तविक समीक्षक होते हैं।ऐसा नहीं है कि उनमें पक्षपात पूर्ण पत्रकारिता नहीं होती। उनमें भी विचारधारा के आधार पर मतभेद हैं पर उनमें अभद्रता नहीं होती। श्रवण गर्ग, रवीश कुमार, आशुतोष, संजय शर्मा, पुण्य प्रसून, अभिषेक, अशोक कुमार पाण्डेय, आनंद सिंह, अजीत अंजुम, शीतल पी सिंह, प्रो अजय दुबे, एस के सिंह इत्यादि सैकड़ों नाम हैं जो गंभीर समीक्षक हैं। इनकी समीक्षाएं अत्यंत गंभीर होती हैं तथा लगभग यथार्थ से जुड़ी होती हैं और प्रवक्ताओं को गंभीर होना भी चाहिए । तू तड़ाक की भाषा अमर्यादित और अशिष्ट होती है। टीआरपी महत्वपूर्ण नहीं होती महत्वपूर्ण होता है तथ्यों का सही संप्रेषण।यदि मूल तथ्य छोड़कर कुछ भी परोसा जाने लगा तो एंकरों की राष्ट्रीय और सामाजिक छवि दोनों गिर जाती है।
बहुत से ऐसे राष्ट्रीय एंकर हैं जो प्रसिद्ध तो बहुत हैं पर अपनी नेगेटिविटी के कारण न कि अच्छे एंकर के रूप में। अभी हाल में लल्लनटॉप के संपादक और एंकर सौरभ को सच की कीमत चुकानी पड़ी है। लेकिन सौरभ को अपने व्यक्तित्व और कौशल को सुधारने की जरूरत नहीं है। सौरभ ने अपनी पत्रकारिता और एंकर को अपने व्यक्तित्व में समाहित किया है। उनके फ़ॉलोअर्स उनके अगले कदम की राह तक रहे हैं।दुनिया में पैसा तो भीख मांगने वाले के पास भी बहुत है।इसलिए आवश्यक है कि पत्रकारिता के अच्छे गुणों को साथ में लेकर चलें और जनता के हृदय में समा जाएं।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)





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