रंगों की रागनी में स्त्री-अस्मिता

- गंगा पाण्डेय
महिलाओं की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना में स्त्री-अस्मिता, प्रतिरोध, उल्लास और आत्म स्वीकृति का अद्भुत संगम है। यह वह पर्व है जहाँ परंपरा और स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक बनकर उभरते हैं। सदियों से होली सामाजिक संरचनाओं के भीतर एक ऐसे अवकाश की तरह उपस्थित रही है, जिसमें स्त्रियाँ अपनी भावनाओं, इच्छाओं और सामूहिक ऊर्जा को निर्भीक स्वर दे सकें। इसलिए महिलाओं की होली को समझना, भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति और उसकी बदलती भूमिका को समझने जैसा है।
ब्रजभूमि में होली का स्वरूप विशेष रूप से स्त्री-केंद्रित दिखाई देता है। बरसाना की लठमार होली में जब महिलाएँ लाठियां उठाकर पुरुषों पर प्रतीकात्मक प्रहार करती हैं, तो यह दृश्य केवल हास्य या लोक-उत्सव नहीं होता, यह सत्ता-संतुलन का सांस्कृतिक रूपक बन जाता है। इसी प्रकार नंदगाँव में भी यह परंपरा स्त्री की सक्रिय भागीदारी और उसकी सामाजिक उपस्थिति को रेखांकित करती है। वृंदावन की होली में राधा-कृष्ण की लीलाओं का रंग घुला रहता है, जहाँ प्रेम और भक्ति के माध्यम से स्त्री-स्वर अपनी आध्यात्मिक स्वतंत्रता की अनुभूति करता है। इन परंपराओं में स्त्री केवल दर्शक नहीं, बल्कि उत्सव की केन्द्रीय नायिका होती है।

लोक-संस्कृति में होली के फाग और रसिया गीतों का विशेष महत्व है। इन गीतों में स्त्रियाँ अपने मन की गांठें खोलती हैं। वे ससुराल की कठोरताओं पर व्यंग्य करती हैं, पति की उपेक्षा पर चुटकी लेती हैं, और कभी-कभी सामाजिक रूढ़ियों पर तीखा कटाक्ष भी करती हैं। यह सब कुछ उत्सव की मर्यादा के भीतर होता है, किंतु इसकी प्रभावशीलता गहरी होती है। होली के अवसर पर स्त्रियों को जो वाचिक स्वतंत्रता मिलती है, वह वर्ष भर की मौन पीड़ा का सृजनात्मक विसर्जन बन जाती है। इस दृष्टि से महिलाओं की होली सांस्कृतिक विमर्श का एक सशक्त मंच है, जहाँ हास्य के माध्यम से गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाए जाते हैं।
पारंपरिक भारतीय समाज में स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी सीमित थी। परंतु होली जैसे पर्वों ने इस सीमितता को अस्थायी रूप से भंग किया। रंगों की आड़ में सामाजिक दूरी कम होती थी, और स्त्रियाँ खुलकर नृत्य-गान में भाग लेती थीं। यह अस्थायी मुक्ति ही धीरे-धीरे स्थायी आत्मविश्वास का आधार बनी। जब कोई स्त्री समुदाय के बीच निर्भीक होकर गाती है, हँसती है और रंग लगाती है, तो वह केवल उत्सव नहीं मना रही होती; वह अपने अस्तित्व को स्वीकार रही होती है।

आधुनिक समय में महिलाओं की होली ने एक नया आयाम ग्रहण किया है। महानगरों और छोटे शहरों में ‘महिला होली मिलन’ जैसे आयोजन लोकप्रिय हो रहे हैं, जहाँ स्त्रियाँ सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में उत्सव मनाती हैं। इन कार्यक्रमों में संगीत, नृत्य, कविताएँ, नाट्य-प्रस्तुतियों और सामाजिक मुद्दों पर संवाद भी शामिल होते हैं। यहाँ होली केवल रंगों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकता जैसे विषयों से जुड़ जाती है।


इस प्रकार होली आधुनिक स्त्री के लिए आत्म-अभिव्यक्ति का मंच बन जाती है।हालाँकि, महिलाओं की होली के संदर्भ में चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। कभी-कभी इस पर्व की आड़ में अनुचित व्यवहार, छेड़छाड़ या असम्मानजनक टिप्पणियाँ सामने आती हैं, जो स्त्रियों की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। “बुरा न मानो होली है” जैसी उक्ति का दुरुपयोग तब होता है, जब सहमति और मर्यादा की सीमाएँ लांघी जाती हैं। अतः आवश्यक है कि समाज होली की मूल भावना—प्रेम, सौहार्द और सम्मान—को समझे और उसका पालन करे। महिलाओं की स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह सुरक्षा और गरिमा के साथ जुड़ी हो।

ग्रामीण भारत में महिलाओं की होली आज भी सामुदायिक एकता का प्रतीक है। खेतों की मेड़ों पर, आँगनों में, या गाँव की चौपालों में ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले फाग, रंगों से भीगे हुए चेहरे, और सामूहिक हँसी, ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो जीवन की कठिनाइयों को कुछ समय के लिए भुला देता है। वहीं शहरी परिवेश में महिलाएँ आधुनिक संगीत, डीजे और थीम आधारित आयोजनों के माध्यम से अपनी रचनात्मकता प्रकट करती हैं।
परंपरा और आधुनिकता का यह संगम भारतीय स्त्री की बहुआयामी पहचान को उजागर करता है। महिलाओं की होली का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। रंगों का प्रयोग व्यक्ति के भीतर दबी भावनाओं को बाहर लाने में सहायक होता है। जब स्त्रियाँ एक-दूसरे को रंग लगाती हैं, तो वे सामाजिक भेदभाव, वर्ग और उम्र की सीमाओं को पार करती हैं। यह समता का क्षण होता है, जहाँ हर चेहरा एक समान रंग में रंगा हुआ दिखाई देता है। इस प्रतीकात्मक समता में स्वतंत्रता का बीज छिपा होता है।

डिजिटल युग में महिलाओं की होली ने वैश्विक पहचान प्राप्त की है। सोशल मीडिया के माध्यम से वे अपनी परंपराओं, वेशभूषा और लोकगीतों को विश्व-पटल पर प्रस्तुत करती हैं। भारतीय प्रवासी समुदायों में भी महिलाएँ होली के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहती हैं और अगली पीढ़ी को इस परंपरा से परिचित कराती हैं। इस प्रकार होली केवल स्थानीय उत्सव न रहकर वैश्विक सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बनती जा रही है।
महिलाओं की होली उस यात्रा का प्रतीक है जिसमें परंपरा और स्वतंत्रता साथ-साथ चलती हैं। यह पर्व स्त्री को अपनी जड़ों से जोड़े रखते हुए उसे पंख भी देता है। रंगों की यह वर्षा केवल शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा को भी स्पर्श करती है। जब स्त्री निर्भीक होकर हँसती है, गाती है और अपने चारों ओर रंग बिखेरती है, तो वह जीवन के प्रति अपने अटूट विश्वास की घोषणा करती है। महिलाओं की होली इसी विश्वास, इसी उल्लास और इसी स्वतंत्रता का उत्सव है, जहाँ परंपरा सम्मानित होती है और स्वतंत्रता सशक्त।
(बाढ़, बिहार)

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