युद्ध की चुनौती और चिंताएं
राजीव त्यागी 
इजराइल-अमेरिका के ईरान पर हमले और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई ने दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। खास तौर से इस युद्ध में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने के बाद जहां ईरानी सेना ने इजराइल-अमेरिका से इसका पूरा बदला लेने और इजराइल-अमेरिका के द्वारा ईरान को पूरी तरह से कमजोर किए जाने के वक्तव्यों से इस युद्ध के लंबा खींचने की आशंका बढ़ गई है। 

ऐसे में भारत की भी चिंताएं बढ़ सकती हैं। ये चिंताएं कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, शेयर बाजार में गिरावट, माल ढुलाई की लागत बढऩे, खाद्य वस्तुओं की महंगाई, भारत से बासमती चावल, चाय, मशीनरी, इस्पात तथा फुटवियर जैसे क्षेत्रों में निर्यात, निर्यात के लिए बीमा लागत में वृद्धि, पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा की चिंता तथा इजराइल और ईरान के सहित पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार में कमी की आशंकाओं से संबंधित हैं। ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच युद्ध का असर वैश्विक शिपिंग रूट्स पर भी पड़ सकता है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर। ईरान ने 33 किलोमीटर चौड़ा यह जल मार्ग रोक दिया है। 

यह वैश्विक यातायात का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। दुनिया को मिलने वाला करीब एक-तिहाई तेल और खाद्य व कृषि उत्पादों का अधिकांश यातायात इसी मार्ग से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में शिपिंग बाधित होने से कच्चे तेल की ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। साथ ही इससे खाद्य पदार्थों, जैसे कि गेहूं, चीनी और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतें बढऩे लगेंगी। चूंकि भौगोलिक रूप से ईरान भारत का पड़ोसी क्षेत्र है और कच्चे तेल के लिहाज से भारत का करीब आधा कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर आता है, ऐसे में यह युद्ध भारत के लिए कच्चे तेल संबंधी चिंता निर्मित करते हुए दिखाई दे रहा है। 
चूंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के करीब 85 फीसदी तक आयात पर निर्भर है, अतएव कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी भारत के आयात बिल की चिंता बढ़ा सकती है। स्थिति यह है कि युद्ध के तनाव के बीच 28 फरवरी को कच्चे तेल की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल के मूल्य स्तर पर पहुंच गई, जो सात माह का रिकॉर्ड मूल्य स्तर है। युद्ध के लंबा खींचने पर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है। ईरान दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल उत्पादकों में से एक है और यह देश युद्धग्रस्त देश है। ऐसे में ईरान के तेल बाजार में अस्थिरता से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढऩे पर पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने लगेंगे। इसका असर भारत पर भी हो सकता है। इस युद्ध से वैश्विक शेयर बाजार के साथ-साथ भारत के शेयर बाजार पर भी बड़ा असर पडऩे की आशंका है। साथ ही इससे वैश्विक स्तर के साथ-साथ भारत में भी सोने की खपत और सोने की कीमत और तेजी से बढ़ेगी। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध के लंबा खिंचे जाने पर पश्चिम एशिया में रहने वाले करीब 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा भी भारत के लिए चिंता का कारण बन सकती है। इस युद्ध का प्रभाव भारत के वित्तीय बाजार पर भी पड़ सकता है और भारतीय रुपया कमजोर भी हो सकता है। 

लेकिन ईरान और इजराइल-अमेरिका युद्ध के बीच भारत के कई ऐसे मजबूत आर्थिक पक्ष हैं, जिनसे भारत के आम आदमी और भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक नुकसान नहीं होगा। खास बात यह है कि इस समय भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। यह भी महत्वपूर्ण है कि रबी सीजन 2026 में गेहूं की बुवाई का रकबा बढक़र 334.17 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले साल 328.04 लाख हेक्टेयर था। एक खास बात यह है कि भारत में महंगाई नियंत्रित है। भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। महंगाई दर 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे है। 

इस समय भारत के पास 74 दिनों की रणनीतिक कच्चा तेल भंडार उपलब्ध है। पहले भारत 27 देशों से कच्चा तेल खरीदता था, अब इन देशों की संख्या बढक़र 39 हो गई है। इससे कुछ ही देशों से तेल खरीदने संबंधी जोखिम कम हो गई है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के बजट के तहत शीघ्र खराब होने वाले सामान की बाजार में समुचित आपूर्ति सुनिश्चित करने, महंगाई नियंत्रण और जरूरी दवाइयों की किफायती दाम पर आपूर्ति के लिए जो प्रभावी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं, वे युद्ध की चुनौती के बीच भारत के आम आदमी को राहत देते हुए दिखाई दे सकेंगी।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts