'वंदे मातरम' की अनिवार्यता पर छिड़ा सियासी संग्राम

 मौलाना बोले- 'मजहब में इजाजत नहीं', विपक्ष ने सरकार को घेरा

नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी किए गए नए दिशानिर्देशों ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है। गृह मंत्रालय के ताजा आदेश के अनुसार, अब सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य होगा। साथ ही, इस दौरान वहां मौजूद प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक खड़ा होना होगा। सरकार के इस फैसले के सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने मोर्चा खोल दिया है।

इस्लाम की दुहाई और मौलानाओं का विरोध सरकार के इस आदेश पर मुस्लिम धर्मगुरुओं और मौलानाओं ने कड़ी आपत्ति जताई है। कई प्रमुख मौलानाओं का तर्क है कि 'वंदे मातरम' के कुछ अंशों में मातृभूमि की वंदना की गई है, जबकि इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत की इजाजत है। उनका कहना है कि किसी भी चीज को जबरन थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। मौलानाओं ने स्पष्ट किया कि वे देश का सम्मान करते हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के साथ समझौता करना उनके लिए संभव नहीं है।

विपक्ष ने बताया ध्रुवीकरण की राजनीति विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के इस कदम को आगामी चुनावों से पहले 'ध्रुवीकरण' की कोशिश करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार असल मुद्दों जैसे बेरोजगारी और महंगाई से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के भावनात्मक और विवादास्पद आदेश जारी कर रही है। विपक्ष का तर्क है कि देशभक्ति दिल से आती है, इसे किसी कानून या आदेश के जरिए अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

 सहारनपुर में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मौलाना मदनी ने दो टूक शब्दों में कहा कि एक मुसलमान किसी भी कीमत पर वंदे मातरम् नहीं गा सकता क्योंकि यह उनके धार्मिक अकीदे और इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने इस मुद्दे को देशभक्ति से जोड़ने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी पर अपनी पसंद थोपना भारतीय संविधान की मूल भावना के विपरीत है और यह देशभक्ति नहीं बल्कि केवल राजनीति है।

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धार्मिक आस्था और देशभक्ति का दिया तर्क

मौलाना मदनी ने विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत या वंदना करना वर्जित है। वंदे मातरम् का अर्थ धरती या मातृभूमि की पूजा से जुड़ा है जिसे मुस्लिम समुदाय स्वीकार नहीं कर सकता। उन्होंने तर्क दिया कि किसी गीत को न गाने का मतलब यह कतई नहीं है कि वह व्यक्ति अपने देश से प्रेम नहीं करता। मदनी ने कहा कि मुसलमान इस मुल्क से बेपनाह मोहब्बत करते हैं और इसकी आजादी के लिए उन्होंने बड़ी कुर्बानियां दी हैं लेकिन इबादत सिर्फ ईश्वर की ही होगी।

संविधान देता है अपनी पसंद का अधिकार

मौलाना मदनी ने सरकार और राजनीतिक दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि आज के दौर में देशभक्ति का प्रमाण देने के लिए प्रतीकों का सहारा लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और अपनी मान्यताओं के अनुसार जीने की आजादी देता है। किसी भी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ कोई विशेष गीत गाने के लिए मजबूर करना संवैधानिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ शक्तियां जानबूझकर ऐसे मुद्दे उछालकर समाज में विभाजन पैदा करना चाहती हैं और अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही हैं।

राजनीतिक रोटियां सेंकने का लगाया आरोप

दनी ने अपने संबोधन में साफ किया कि वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने की कोशिशें केवल राजनीतिक लाभ के लिए की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि देश के वास्तविक मुद्दों जैसे बेरोजगारी और महंगाई से ध्यान भटकाने के लिए अक्सर ऐसे भावनात्मक विवाद खड़े किए जाते हैं। मदनी के इस बयान के बाद एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। दक्षिणपंथी संगठनों ने मदनी के इस रुख की आलोचना करते हुए इसे राष्ट्रविरोधी मानसिकता बताया है जबकि जमीयत अपने रुख पर कायम है। फिलहाल इस बयान के बाद जनपद में सुरक्षा और सतर्कता बढ़ा दी गई है।

सरकार का पक्ष: राष्ट्र के प्रति सम्मान जरूरी दूसरी ओर, सरकार और सत्ता पक्ष के नेताओं ने इस आदेश का पुरजोर समर्थन किया है। उनका कहना है कि 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक रहा है और राष्ट्रगीत का सम्मान करना हर नागरिक का संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य है। सरकार का तर्क है कि इस आदेश का उद्देश्य देश के नागरिकों में राष्ट्रीय एकता और गौरव की भावना को और मजबूत करना है।


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