किला रोड रनवे से उड़ेंगे दुश्मनों की निगहबानी के लिए ड्रोन?
-बीआरओ भारत का पहला ड्रोन रनवे और विमानन बेस मेरठ बनाने जा रहा है
-परियोजना देश की रक्षा तैयारियों और ड्रोन तकनीक में मील का पत्थर साबित होगी
मेरठ। दुश्मनों की निगहबानी के लिए बीआरओ किला रोड पर 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा ड्रोन रनवे बनाने जा रही है। परिजनों में 406 करोड़ खर्च होने का अनुमान है और यह ड्रोन बेस 900 एकड़ में फैला होगा। बीआरओ पिछले साल लद्दाख के न्योमा में दुनिया का सबसे ऊंचा लड़ाकू हवाई क्षेत्र भी बना चुकी है। किला रोड पर बनने वाला यह एक ड्रोन रनवे नहीं होगा, बल्कि भविष्य के ड्रोन युद्ध के लिए मेरठ भारत का एक प्रमुख हब बनने जा रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर' के बाद भारत सरकार ने देश की सुरक्षा को नया आयाम दिया है। मेरठ में देश का पहला समर्पित मानव रहित विमान (यूएवी) और ड्रोन रनवे विकसित करने की तैयारी पूरी हो गई है। देश की राजधानी दिल्ली के निकट होने के कारण इससे सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस परियोजना के बनने के बाद देश की हवाई चौकसी को नई मजबूती मिलेगी। इस परियोजना से केवल रक्षा नहीं, बल्कि मेरठ और आस-पास के इलाकों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। यहां ड्रोन की ट्रेनिंग और मरम्मत के लिए बड़े सेंटर बनेंगे, जिससे तकनीकी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं को मौके मिलेंगे। इसका दायित्व सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को दिया गया है और इसका टेंडर भी बीआरओ के मुख्य अभियंता ने जारी कर दिया है।
परियोजना के खास बिंदु
किला रोड के पास के पास बनने वाला यह बेस 900 एकड़ में फैला होगा। इस परियोजना पर करीब 406 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह मुख्य रूप से HALE (High Altitude Long Endurance) ड्रोन और मानव रहित विमानों के संचालन के लिए होगा। इनका उपयोग सीमा की निगरानी और टोही मिशनों के लिए किया जाता है। रनवे 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा होगा, जिस पर ड्रोन के साथ-साथ सी-130 और सी-295 जैसे परिवहन विमान भी उतर सकेंगे। इसमें दो बड़े हैंगर, अत्याधुनिक लाइटिंग और नेविगेशन सिस्टम होंगे, जिससे कम दृश्यता में भी ड्रोन ऑपरेट किए जा सकेंगे।
तकनीकी विशेषताएं
रनवे की क्षमता:- रनवे की बनावट ऐसी है कि यह ड्रोन से प्रिडेटर या एमक्यू-9B सी गार्जियन का भार आसानी से सह सके।
एडवांस लाइटिंग सिस्टम:- यहां सीएटी-II स्तर का नेविगेशन और लाइटिंग सिस्टम लगाया जाएगा। ताकि कोहरे या खराब मौसम में भी ड्रोन और विमान सुरक्षित लैंड कर सकें।
हैंगर:- यहां विशेष रूप से डिजाइन किए गए दो बड़े हैंगर होंगे, जहां ड्रोन का रखरखाव और उनकी मरम्मत की जा सकेगी।
रणनीतिक महत्व
सुरक्षा का केंद्र:- मेरठ की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से भारत की उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं (चीन और पाकिस्तान) पर करीब से नजर रखी जा सकती है।
त्वरित तैनाती:-
किसी भी आपात स्थिति में, यहां से ड्रोन उड़ान भरकर बहुत कम समय में एलएसी या फिर एलओसी तक पहुंच सकते हैं।
स्वदेशी परीक्षण:-
यह बेस 'रुस्तम-2' और 'घातक' जैसे भारत के स्वदेशी ड्रोन के परीक्षण और प्रशिक्षण के लिए भी एक सुरक्षित केंद्र बनेगा।
भविष्य की तैयारी
इस बेस को इस तरह डिजाइन किया गया है कि भविष्य में इसे और विस्तारित किया जा सकेगा, ताकि यहां भारी मालवाहक विमान, जैसे सी-17 ग्लोबमास्टर भी उतारे जा सकेंगे। इस परियोजना की रोचक बात यह है कि परियोजना को हिमरक्षक या इसी तरह के सुरक्षात्मक अभियानों के साथ जोड़कर देखा जा रहा है, ताकि हिमालयी सीमाओं पर हमारी चौकसी 24/7 बनी रहे।
प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और भविष्य
मेरठ बेस से सालाना लगभग 1,500 ड्रोन ऑपरेशन्स ( यानी हर दिन करीब चार 4 उड़ानें) संभालने में सक्षम होगा। इस परियोजना को पूरा करने के लिए लगभग 85 महीनों का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें निर्माण के साथ-साथ अगले कुछ वर्षों तक रखरखाव की जिम्मेदारी भी बीआरओ की होगी।
रोचक जानकारी
मेरठ में इस समर्पित ड्रोन बेस को बनाने का फैसला ऑपरेशन सिंदूर (2025) से मिली सीख के बाद लिया गया। इस ऑपरेशन में ड्रोन ने निगरानी और सटीक हमले में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। इसी सफलता को देखते हुए सरकार ने महसूस किया कि ड्रोन के लिए एक अलग और बड़ा एयरबेस होना चाहिए।
बीआरओ की महत्वपूर्ण उपलब्धियां
-बीआरओ ने लद्दाख के न्योमा में दुनिया का सबसे ऊंचा फाइटर एयरफील्ड लगभग तैयार कर लिया है, जो 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह वास्तविक नियंत्रण रेखा से मात्र 35 किलोमीटर दूर है, जिससे चीन सीमा पर हमारी पकड़ और मजबूत हो गई है।
-बीआरओ शिंकु ला दर्रे पर दुनिया की सबसे ऊंची टनल बना रहा है (लगभग 15,800 फीट पर)। यह हिमाचल की लाहौल घाटी को लद्दाख की जांस्कर घाटी से जोड़ेगी। इसका फायदा यह होगा कि लद्दाख के लिए 12 महीने रास्ता खुला रहेगा, जो अभी सर्दियों में बर्फबारी के कारण बंद हो जाता है।
बीआरओ का काम
बीआरओ मुख्य रूप से अर्थ सीमा सड़क संगठन है। यह भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित संगठन है, जो देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास का काम करता है।बीआरओ का मुख्य कार्य हिमालय और अन्य दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में सड़कों का निर्माण और रखरखाव। चुनौतीपूर्ण भौगोलिक स्थितियों में रणनीतिक पुलों और सुरंगों (जैसे अटल टनल) का निर्माण। युद्ध के समय या शांति काल में भारतीय सशस्त्र बलों के लिए रसद और आवाजाही का रास्ता साफ रखना। बर्फबारी या लैंडस्लाइड के समय रास्तों को तुरंत खोलना। बीआरओ रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। इसका आदर्श वाक्य ‘श्रमण सर्वम साध्यम’ (कठोर परिश्रम से सब कुछ संभव है)। इसकी स्थापना 7 मई 1960 को हुई थी और इसका मुख्यालय दिल्ली में है।


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