जलवायु संकट और मानव
इलमा अज़ीम
जलवायु संकट आधुनिक मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा अस्तित्वगत खतरा है, जो जीवाश्म ईंधन के दहन और वनों की कटाई के कारण उत्पन्न हुआ है। इसके परिणामस्वरूप भयंकर गर्मी, सूखे, बाढ़ और समुद्री जलस्तर में वृद्धि हो रही है, जिससे 2050 तक करोड़ों लोगों का विस्थापन और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव (कुपोषण, बीमारियां) पड़ने का अनुमान है वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि कोयला, तेल और गैस पर हमारी निर्भरता जल्द कम नहीं हुई तो धरती का तापमान ऐसे स्तर तक पहुँच जाएगा, जहाँ जीवन की वर्तमान संरचनाएँ टिक नहीं पाएँगी।
इसके बावजूद वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आज भी जीवाश्म ईंधनों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। इस पूरी व्यवस्था की भयावह बात यह है कि जब कोई सरकार पर्यावरण और जनता के हित में कदम उठाने की कोशिश करती है, तो उसे न्याय के नाम पर दंडित किया जाता है। पिछले कुछ दशकों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश समझौतों के जरिये एक ऐसा कानूनी ढांचा खड़ा किया गया है, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सरकारों पर मुकदमा कर सकती हैं। इसे निवेशक राज्य विवाद निपटान प्रणाली (आईएसडीएस) कहा जाता है।
इसके तहत यदि कोई सरकार पर्यावरण, स्वास्थ्य या सामाजिक हित में ऐसा निर्णय लेती है, जिससे किसी कंपनी के मुनाफे पर असर पड़ता है, तो वह कंपनी सरकार से न केवल अपने निवेश की भरपाई, बल्कि संभावित भविष्य के मुनाफे का भी दावा कर सकती है। ये मुकदमे सामान्य अदालतों में नहीं, बल्कि गुप्त ट्रिब्यूनलों में चलते हैं, जहाँ न पारदर्शिता होती है, न जनता की भागीदारी और न ही लोकतांत्रिक जवाबदेही। यह व्यवस्था अपने आप में लोकतंत्र के लिए एक गहरा खतरा है। सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं, ताकि वे जनता और पर्यावरण के हित में फैसले लें। लेकिन आईएसडीएस जैसे प्रावधानों के कारण वही सरकारें कंपनियों के डर से पीछे हटने लगती हैं। आईएसडीएस की मार सबसे पहले उन देशों पर पड़ी है, जिन्होंने पर्यावरण और जनता के हित में साहसिक फैसले लिए। जर्मनी ने जब परमाणु ऊर्जा से बाहर निकलने का निर्णय किया तो ऊर्जा कंपनी वाटनफॉल ने उस पर अरबों यूरो का दावा ठोक दिया।
पाकिस्तान ने एक खनन परियोजना को पर्यावरणीय कारणों से रोका तो उस पर छह अरब डॉलर से अधिक का जुमार्ना लगाया गया, जो उसके पूरे शिक्षा और स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा था। स्लोवेनिया में एक ब्रिटिश कंपनी को केवल यह कहने पर कि फ्रैकिंग से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन जरूरी है, सरकार पर 120 मिलियन यूरो का मुकदमा कर दिया गया और अंततः सरकार को झुकना पड़ा। कोलंबिया में आदिवासी समुदायों के संघर्ष से एक कोयला खदान परियोजना रुकी, लेकिन कंपनियों ने ब्रिटेन-कोलंबिया संधि के तहत सरकार से मुआवजा वसूल लिया। इन उदाहरणों का खतरनाक असर यह है कि सरकारें पर्यावरण बचाने से पहले अब यह सोचने लगती हैं कि कहीं उन्हें अंतरराष्ट्रीय अदालतों में अरबों डॉलर का हजार्ना न भरना पड़ जाए।





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