कैसे सशक्त बने महिला !

महिलाओं की आर्थिक स्थिति व सामाजिक मानसिकता में मूलभूत बदलाव की अनुपस्थिति में सशक्तिकरण की बात करनी बेमानी होगी।  महिलाओं को संपत्ति में अधिकार न होना, जिसकी वजह से उन्हें बोझ व पराया धन समझने की प्रवृत्ति बनती है। पितृ सत्तात्मक समाजों में पुत्र ताकत का प्रतीक है। वंश धारक, मां-बाप को मुखाग्नि देने वाला व बुढ़ापे का सहारा माना जाता है। 

लड़कियों की असुरक्षा व दहेज हिंसा आमतौर पर लड़की भ्रूण हत्या के मुख्य कारण उभर कर आते हैं। कुछ तबकों को छोड़कर हमारा समाज न तो दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए इसके खिलाफ लड़ता नजर आता है और न ही महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाता है। इस असहाय समर्पणकारी मानसिकता के खिलाफ सामाजिक सक्रियता को हासिल करने के जनजागरण अभियान चलाने होंगे। दहेज के खिलाफ और महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम संस्थाओं को संघर्ष करना होगा।

 शादियों पर खर्च कम होने की बजाय और बढ़ता ही जा रहा है। कहा जाता है कि महिला सशक्तिकरण एक ऐसी अनिवार्यता है जिसकी अवहेलना किसी भी समाज और देश के विकास की गति को धीमा कर देती है। इसलिए पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की भी हर क्षेत्र में भागीदारी एक महत्वपूर्ण किरदार निभाती है, परंतु जब इंटरनेट आया तो उसके बाद पुरुषों का ही इससे ज्यादा संबंध रहा है। ऐसे में आधी आबादी इससे बहुत अधिक परिचित नहीं हो सकी।


 लेकिन बदलते समय के साथ साथ धीरे धीरे ही सही, महिलाएं भी इंटरनेट से जुड़ने लगी हैं। हालांकि अभी भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की बात करें तो इसकी रफ़्तार बहुत धीमी है। ऐसे में महिला यौन हिंसा के आरोप लगने पर सख्त से सख्त सजा सुनिश्चित करवानी होगी। वक्त की मांग है महिलाओं को संपत्ति में अधिकार व ज्यादा से ज्यादा रोजगार देना होगा। इस विरोधाभास को खत्म करना होगा।

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