वनों की कटाई और प्रदूषण
इलमा अज़ीम
ग्लोबल वार्मिंग तथा प्रदूषण की मार झेलते शहरों के लिए पेड़ों की कमी भी जिम्मेदार है। हमारे शास्त्रों में भी लिखा गया है कि एक पेड़ लगाना सौ गायों का दान देने के समान है। कहा जाता है कि पेड़ों की कतार धूल मिट्टी को 75 फीसद तक कम कर देती है और 50 फीसदी तक शोर को कम करती है। जो इलाका पेड़ों से घिरा होता है वह दूसरे दूसरे इलाकों की तुलना में 9 डिग्री ठंडा रहता है।
वहां का एक पेड़ इतनी ठंडक पैदा करता है जितना एक एसी दस कमरों में 20 घंटों तक चलने पर करता है। कम होते पेड़ों की वजह से कई दुष्प्रभाव होते हैं, जिसमें प्राकृतिक बाधाएं भी शामिल हैं। वनों की कटाई की वजह से भूमि का क्षरण होता है क्योंकि वृक्ष पहाड़ियों की सतह को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनों के विनाश के कारण वन्यजीव खत्म हो रहे हैं। पेड़ों की कई प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर हैं तथा कुछ तो लुप्त हो गई हैं।
वनों की कटाई से वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है। बारिश भी अनियमित हो जाती है। इन सबके कारण ‘ग्लोबल वार्मिंग’ में इजाफा होता है। रेगिस्तान फैल रहा है। नदियों का पानी उथला कम, गहरा तथा प्रदूषित हो रहा है क्योंकि उनके किनारों और पहाड़ों पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। जंगल के लिए आदिवासियों का अस्तित्व आवश्यक है। जंगल का उपयोग कैसे करना है आदिवासियों को इसकी पूरी जानकारी रहती है क्योंकि वन संरक्षण के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान होता है। पौधारोपण की कमी के कारण इस अनमोल प्राकृतिक संपत्ति का तेजी से क्षरण हो रहा है, जो जीवन और पर्यावरण के संतुलन को खराब कर रहा है। जंगल की कटाई के कारण जंगली जानवर गांवों में शरण ले रहे हैं।
वैसे भारत में कुछ साल पहले ‘चिपको आंदोलन’ काफी चर्चित हुआ था, जिसके अगुवा सुंदरलाल बहुगुणा थे। दरअसल, यह आंदोलन इसलिए प्रारम्भ किया गया था कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में सरकार ने पेड़ों की अंधाधुंध कटाई प्रारम्भ कर दी थी। सुंदरलाल बहुगुणा ने सैकड़ों की संख्या में ग्रामीणों को एकत्र किया और इनमें से एक ग्रामीण एक पेड़ से चिपक गया ताकि उसे काटा न जा सके। इस आंदोलन को काफी सफलता मिली थी। आज जरूरत इस बात की है कि पेड़ों को बचाने के लिए आम लोग जागरूक हों।



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