हाय रे मोटापा
- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'
छंगामलपुर के पावन परिक्षेत्र में वजन नापने की मशीन दरअसल उन लोगों का खिलौना है जिनके पास जीवन में कोई ठोस उद्देश्य नहीं बचा है। यहाँ समृद्धि को अंकों में नहीं, बल्कि कमर के भव्य घेरे में नापा जाता है। तहसील के गलियारों में किसी को 'मोटा' कहना गाली नहीं, बल्कि एक चारित्रिक प्रमाण-पत्र है जो इस बात की पुष्टि करता है कि संबंधित व्यक्ति ने सार्वजनिक सेवा की वैतरणी को सफलतापूर्वक पार कर लिया है और अब उसके पास इतना 'अधिशेष' है कि उसे संभालने के लिए एक विशेष दर्जी और दो-तीन अतिरिक्त कुर्सियों की आवश्यकता है। इसके विपरीत, एक दुबले आदमी को यहाँ गहरी संशय की दृष्टि से देखा जाता है। अगर आप दुबले हैं, तो या तो आप व्यवस्था को उखाड़ फेंकने वाले क्रांतिकारी हैं, या फिर ईमानदारी के किसी जानलेवा दौरे से गुजर रहे हैं। दुबला आदमी स्थानीय प्रशासनिक प्रोटोकॉल के लिए एक खतरा है, क्योंकि उसकी फुरती यह संकेत देती है कि वह काम निपटाने के लिए दौड़ भी सकता है, जो कि यहाँ की 'स्थिरता' वाली संस्कृति का सीधा अपमान है।
गयादीन का पेट अब उनके शरीर का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वायत्तशासी निकाय बन चुका है जो अपनी मर्जी से फैसले लेता है। जब वे बैठते हैं, तो उनका उदर उनकी जाँघों पर इस तरह विराजमान होता है जैसे कोई वफादार कुत्ता अपने मालिक की गोद में अपनी जगह पक्की कर चुका हो। उनके लिए चलना कोई शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक भारी भरकम लॉजिस्टिक चुनौती है—एक लयबद्ध डगमगाहट, जो देखने वाले को किसी टेक्टोनिक प्लेट के खिसकने का आभास कराती है। उनके कुर्ते के चाक हर रोज इंजीनियरिंग का एक अद्भुत चमत्कार दिखाते हैं, जो आगे और पीछे के पल्लों के बीच बढ़ते हुए भौगोलिक फासले को पाटने की कोशिश में अपनी आखिरी साँसें गिनते रहते हैं।
वे आधुनिक डॉक्टर, जो स्टेथोस्कोप लटकाए 'कोलेस्ट्रॉल' का डर फैलाते फिरते हैं, दरअसल जीवन की चाशनी में घुले कड़वे नीम की तरह हैं। वे बॉडी मास इंडेक्स की बातें ऐसे करते हैं जैसे खुदा न खास्ता जीवन कोई गणित का इम्तिहान हो। पर छंगामलपुर का दर्शन स्पष्ट है: कोलेस्ट्रॉल वह ग्रीस है जो आत्मा के पहियों को दुनिया की खुरदरी हकीकत से रगड़ खाने से बचाता है। यहाँ पोषण एक विदेशी बीमारी है जो शायद किसी रास्ता भटके हुए एनजीओ के साथ गाँव में दाखिल हुई होगी। हमारा विश्वास तो 'लॉन्जिविटी की डीप-फ्राई थ्योरी' में है—अगर किसी वस्तु को खौलते हुए तेल में इतना तपाया गया है कि उसमें सीसा भी पिघल जाए, तो वह वस्तु समस्त विकारों से मुक्त होकर मोक्ष के योग्य हो जाती है।
यही कारण है कि जब ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर पधारते हैं, तो उन्हें सलाद परोसना एक अघोषित युद्ध की घोषणा माना जाता है। साहब के सम्मान में जलेबियाँ आती हैं—शुद्ध चीनी की वे जटिल कुंडलियाँ जो हमारी कानूनी पेचीदगियों को भी मात देती हैं। जैसे-जैसे साहब जलेबियाँ गटकते हैं, उनकी ठुड्डियाँ गुणात्मक रूप से बढ़ने लगती हैं। तीसरी जलेबी तक पहुँचते-पहुँचते जब उनकी तीन ठुड्डियाँ चमकने लगती हैं, तो जनता इसे उनकी बौद्धिक गहराई का प्रमाण मान लेती है। गाँव की शाश्वत बुद्धि कहती है कि जो आदमी अपनी कैलोरी गिनता है, उसे कभी गाँव का कोई गुप्त रहस्य नहीं बताना चाहिए; जो अपने पेट के प्रति इतना कंजूस है, वह सरकारी बजट के प्रति कितना क्रूर होगा, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।
मोटापा यहाँ अहिंसा का सर्वोच्च शिखर है। एक भारी-भरकम आदमी न तो किसी का पीछा कर सकता है, न किसी से गुत्थमगुत्था हो सकता है; वह बस एक जगह बैठकर दुनिया को अपनी गरिमा से डरा सकता है। जहाँ दुनिया 'जिम' नामक यातनागृहों में पसीना बहाकर कहीं न पहुँचने वाली बेल्टों पर दौड़ती है, वहीं हमने 'रणनीतिक जड़ता' की कला को सिद्ध किया है। गावतकिए के सहारे 45 डिग्री पर लेटकर गुरुत्वाकर्षण को यह काम सौंप देना कि वह आपके मांस को समान रूप से वितरित कर दे, दरअसल ब्रह्मांड की गति के साथ तालमेल बिठाने का हमारा अपना तरीका है। छंगामलपुर के बुजुर्ग, जो दूर से मिट्टी के गोल घड़ों की तरह नजर आते हैं, इस बात के गवाह हैं कि इस अनिश्चित दुनिया में आदमी का वजन ही वह एकमात्र संपत्ति है जिसे वह पूरी तरह अपना कह सकता है। यहाँ कोई 'लाइटवेट' होकर अपनी साख नहीं गिराना चाहता।



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