गुलाब और प्रेम
गुलाब की पंखुड़ियों की भांति
तुम्हारे प्रेम में कोमलता बनी रहे।
गुलाब के फूलों की सुगंध सी
जीवन में प्रेम की खुशबू बनी रहे।
अनुभूतियों की पसरी चुप्पी-सी
तुम्हारी बातों में मिठास बनी रहे।
सौर–रश्मि की प्रतीक्षारत धारा सी
अनुक्षण में तुम्हारी आस बनी रहे।
किरणों की ऊष्मा का नर्म स्पर्श सा
तुम्हारे एहसास हृदय में बसा रहे।
तुमसे दूरियाँ चाहे कितनी भी हों
फिर भी ये प्रीत के धागे जुड़े रहे।
हयात में गैर मौजूदगी के बाद भी
तुम्हारी मौजूदगी मुझमें खिलती रहे।
गुलाब सा खिले हर दिलों में प्रेम
ताकि कविता में प्रेम- लफ्ज़ जिंदा रहे।
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- अम्बिका कुशवाहा अम्बी, पटना।
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काव्य प्रवाह
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