युवा और बचत

 इलमा अज़ीम 
युवाओं को वित्तीय साक्षरता के माध्यम से बचत और निवेश का महत्व समझाना होगा। आज भी बड़ी संख्या में युवा यह नहीं समझ पाते कि बचत और निवेश में अंतर क्या है, महंगाई का असर कैसे पड़ता है, और छोटी-छोटी नियमित बचत किस प्रकार दीर्घकाल में बड़ा संबल बन सकती है। तकनीक का उपयोग यदि उपभोग बढ़ाने में हो रहा है, तो उसी तकनीक का उपयोग बचत और निवेश को सरल और आकर्षक बनाने में भी किया जा सकता है।  परिवार की भूमिका भी यहां अत्यंत महत्वपूर्ण है। 


बच्चों में विवेकपूर्ण खर्च और बचत की आदत बचपन से ही डाली जानी चाहिए। माता-पिता यदि स्वयं संतुलित व्यवहार अपनाएं, तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से अगली पीढ़ी पर पड़ता है। शिक्षा व्यवस्था में भी वित्तीय अनुशासन और आर्थिक साक्षरता को स्थान दिया जाना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी केवल कमाने पर ही नहीं, संभालने और संजोने पर भी ध्यान दे। 


यह याद रखना आवश्यक है कि भविष्य की चिंता करना भय नहीं, बल्कि बुद्धिमानी है। बचत का अर्थ जीवन का आनंद त्याग देना नहीं, बल्कि भविष्य के आनंद को सुरक्षित करना है। संतुलित खर्च और नियमित बचत से ही एक सुरक्षित, आत्मनिर्भर और स्थिर समाज का निर्माण संभव है। भारत यदि आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है, तो उसे केवल उपभोग-आधारित विकास से आगे बढ़कर बचत-संवर्धित विकास मॉडल अपनाना होगा। अंततः, बचत और खर्च के बीच संतुलन केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।


 आर्थिक अनुशासन अपनाकर ही हम भावी पीढ़ी के लिए मजबूत आधार तैयार कर सकते हैं। उभरती अर्थव्यवस्था की यह जिम्मेदारी है कि वह तात्कालिक उपभोग के आकर्षण से ऊपर उठकर दीर्घकालीन स्थिरता को प्राथमिकता दे। तभी भारत का आर्थिक उत्थान टिकाऊ, समावेशी और सुरक्षित बन सकेगा।

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