ग्रीनलैंड विवाद और बदलती वैश्विक धुरी
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर अपनाई गई आक्रामक नीति अब न तो सनक भर रह गई है और न ही चुनावी बयानबाज़ी तक सीमित है। यह 2026 की वैश्विक राजनीति का एक गंभीर और निर्णायक संकट बन चुकी है। जनवरी 2026 में ट्रंप के ऐलान किया कि 1 फरवरी 2026 से डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और फिनलैंड (आठ नाटो देशों) के आयात पर 10% टैरिफ लगेगा, जो 1 जून 2026 से 25% तक बढ़ जाएगा—जब तक ग्रीनलैंड की 'पूर्ण और संपूर्ण खरीद' पर डील नहीं हो जाती। यह बयान उस सोच को उजागर करता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति को कूटनीति नहीं, बल्कि दबाव और सौदेबाज़ी का खेल माना जा रहा है।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का यह रवैया नया नहीं है। 2019 में भी उन्होंने इसे एक “रियल एस्टेट डील” बताया था, जिसे उस समय मज़ाक या कूटनीतिक अपरिपक्वता कहकर टाल दिया गया। लेकिन सात साल बाद वही विचार एक अलग, अधिक संगठित और खतरनाक रूप में सामने आया है। अब इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्कटिक क्षेत्र में चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी और दुर्लभ खनिजों पर नियंत्रण जैसे तर्कों से जोड़ा जा रहा है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब केवल अमेरिका और डेनमार्क के बीच सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे नाटो और वैश्विक व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है।
यूरोप की प्रतिक्रिया इस संकट की गंभीरता को रेखांकित करती है। डेनमार्क ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है, जबकि ग्रीनलैंड के लोग भी सड़कों पर उतरकर अपनी स्वायत्तता और पहचान की रक्षा कर रहे हैं। “कोई दबाव नहीं, कोई संकेत नहीं” जैसे बयान यह दर्शाते हैं कि स्थानीय नेतृत्व किसी भी सूरत में बाहरी दबाव स्वीकार करने को तैयार नहीं है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों ने भी एकजुट होकर ट्रंप की धमकी को अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के खिलाफ बताया है। यूरोप की सड़कों पर गूंजते “यांकी गो होम” जैसे नारे इस असंतोष की तीव्रता को उजागर करते हैं।
ट्रंप के तर्क अपनी जगह साफ हैं। आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जो वैश्विक व्यापार और सैन्य रणनीति दोनों के लिए अहम हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में लिथियम, कोबाल्ट और अन्य रेयर अर्थ एलिमेंट्स की भरपूर उपलब्धता है, जो भविष्य की तकनीक—इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा—के लिए अनिवार्य मानी जाती है। ट्रंप का दावा है कि ग्रीनलैंड 'गोल्डन डोम' मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए रणनीतिक रूप से आवश्यक है, हालांकि विशेषज्ञों का मत है कि वर्तमान पिटुफिक अंतरिक्ष आधार और डेनमार्क के साथ हुए समझौतों के कारण अमेरिका को पहले से ही पर्याप्त पहुंच है, तथा पूर्ण क्रय की जरूरत विवादित है। इन दलीलों के पीछे संसाधनों और प्रभुत्व की पुरानी लालसा ही काम कर रही है।
आर्थिक दृष्टि से यह प्रस्ताव कई गहरे सवाल खड़े करता है। ट्रंप की टीम ने ग्रीनलैंड की संभावित खरीद कीमत 700 बिलियन डॉलर तक बताई है, जिसमें खरीद के अलावा माइंस, इंफ्रास्ट्रक्चर और सब्सिडी के लिए सैकड़ों बिलियन अतिरिक्त खर्च शामिल हैं, और लाभ 10-20 साल बाद दिख सकता है। जबकि विशेषज्ञों का आकलन है कि इससे किसी ठोस आर्थिक लाभ के संकेत कम से कम दो दशक बाद ही सामने आ सकते हैं। इसके बावजूद, टैरिफ जैसे आर्थिक हथियारों के जरिए सहयोगी देशों पर दबाव बनाना नाटो की मूल भावना और आपसी भरोसे के खिलाफ जाता है। यही कारण है कि इस कदम को केवल एक आक्रामक नीति नहीं, बल्कि गठबंधन की विश्वसनीयता पर सीधा खतरा माना जा रहा है।
इस टकराव का प्रभाव यूरोप की सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। वैश्विक सप्लाई चेन पहले ही दबाव में है, और यदि ट्रंप की टैरिफ नीति से ट्रेड वॉर तेज होता है, तो इसके झटके पूरी दुनिया में महसूस किए जाएंगे। इसी बीच रूस और चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहे हैं, और विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की आक्रामक रणनीति अनजाने में उन्हें और रणनीतिक अवसर प्रदान कर सकती है। यह “पावर पॉलिटिक्स” का नया चरण है, जहां आर्थिक दबाव को भू-राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम अप्रत्यक्ष होते हुए भी दूरगामी असर रखने वाला है। भारत आर्कटिक काउंसिल का ऑब्जर्वर है और जलवायु परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र में उभरते संसाधनों और नए समुद्री मार्गों में उसकी दिलचस्पी स्वाभाविक है। ग्रीनलैंड के रेयर अर्थ मिनरल्स भारत की इलेक्ट्रिक वाहन नीति, बैटरी निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों के लिए बेहद अहम हैं। यदि अमेरिका इन संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करता है, तो भारत के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं, विशेषकर क्वाड और इंडो-पैसिफिक ढांचे के अंतर्गत।
फिर भी, जोखिम को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ट्रंप की टैरिफ नीति का असर भारत पहले भी महसूस कर चुका है। यदि यूरोप के साथ ट्रेड वॉर गहराता है, तो वैश्विक मांग में संभावित गिरावट भारत की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकती है। इसके साथ ही, अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा करेगा, जिसका सीधा असर भारत के फार्मा, टेक्सटाइल और ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
फिर भी, हर बड़े संकट के भीतर नए अवसरों के बीज छिपे होते हैं। यदि यूरोप अमेरिका से रणनीतिक दूरी बनाता है, तो भारत-यूरोप मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को निर्णायक गति मिल सकती है। यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त साबित होगी, जिससे उसके उद्योगों को नए और स्थिर बाजार मिलेंगे। साथ ही, आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा तेज होने की स्थिति में भारत को रिसर्च, विज्ञान और संसाधन सहयोग के नए और उपयोगी मंच उपलब्ध हो सकते हैं।
भारत की कूटनीति के लिए यह समय संतुलन और सूझ-बूझ की सख्त परीक्षा है। बहुपक्षीयता और संप्रभुता का समर्थक होने के नाते ग्रीनलैंड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भारत को सोच-समझकर तटस्थ रुख अपनाना होगा। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए यूरोप, रूस और चीन के साथ संतुलन साधना ही भारत के दीर्घकालिक हितों की कुंजी है। यही संतुलन भारत को उभरती बहुध्रुवीय दुनिया में एक स्वतंत्र, भरोसेमंद और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
ट्रंप का ग्रीनलैंड प्लान किसी एक द्वीप की खरीद भर का मामला नहीं है। यह उस नई वैश्विक व्यवस्था को गढ़ने की कोशिश है, जिसमें नाटो की एकता, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक व्यापार की स्थिरता दांव पर लगी हुई है। भारत के लिए यह दौर सतर्कता, दूरदर्शिता और स्मार्ट डिप्लोमेसी की मांग करता है। 2026 में दुनिया एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है, जहां लिया गया एक फैसला पूरी वैश्विक राजनीति की दिशा बदल सकता है। यदि भारत इस परिवर्तन को समझदारी से संभालता है, तो वह न केवल चुनौतियों से उबर पाएगा, बल्कि एक सशक्त वैश्विक शक्ति के रूप में और मजबूती से उभरेगा।
(बड़वानी, मप्र)



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