वैश्विक उथल-पुथल के बीच कमजोर पड़ता रुपया


- विशाल कुमार सिंह
भारतीय रुपये की लगातार कमजोरी हाल के वर्षों में गहन बहस का विषय बन गई है, विशेष रूप से आर्थिक सर्वेक्षण 2025- 26 के संदर्भ में, जो यह स्पष्ट करता है कि रुपये के सामने खड़ी चुनौतियाँ मुख्यतः बाहरी कारणों से उत्पन्न हो रही हैं, न कि देश की आंतरिक आर्थिक कमजोरियों के कारण। यह स्थिति पहली नजर में विरोधाभासी लगती है, क्योंकि भारत अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक विकास दर, नियंत्रित महँगाई और कई अन्य देशों की तुलना में अधिक स्थिर वित्तीय प्रणाली का प्रदर्शन कर रहा है। इसके बावजूद रुपये पर गिरावट का दबाव बना हुआ है। इस विरोधाभास को सही ढंग से समझने के लिए वैश्विक आर्थिक वातावरण, अंतरराष्ट्रीय पूँजी प्रवाह की प्रकृति और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का विश्लेषण करना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि आज की आपस में जुड़ी हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की चाल इन्हीं कारकों से गहराई से प्रभावित होती है।

रुपये को प्रभावित करने वाले बाहरी कारकों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वैश्विक पूँजी प्रवाह की अस्थिरता की है। भारत, अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तरह, अपने चालू खाते के घाटे को संतुलित रखने और भुगतान संतुलन को स्वस्थ बनाए रखने के लिए विदेशी पूँजी प्रवाह पर काफी हद तक निर्भर करता है। जब वैश्विक स्तर पर तरलता अधिक होती है और निवेशकों का जोखिम उठाने का भरोसा मजबूत रहता है, तब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक और प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और ऋण बाजारों में बड़े पैमाने पर निवेश करते हैं। लेकिन जैसे ही वैश्विक परिस्थितियाँ सख्त होती हैं, चाहे वह विकसित देशों में ब्याज दरों में वृद्धि के कारण हो, वित्तीय अस्थिरता के चलते हो या किसी बड़े भू-राजनीतिक संकट की वजह से,ये पूँजी प्रवाह तेजी से उलट सकते हैं। ऐसे अचानक हुए पूँजी निकासी के दौर में रुपये पर तत्काल दबाव पड़ता है, भले ही देश की आंतरिक आर्थिक स्थिति मजबूत ही क्यों न हो।

संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबे समय से जारी मौद्रिक सख्ती ने इन पूँजी प्रवाह उलटावों में अहम भूमिका निभाई है। अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने से डॉलर आधारित परिसंपत्तियाँ अधिक आकर्षक हो जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप निवेशक उभरते बाजारों से पूँजी निकालकर अमेरिकी बाजारों की ओर रुख करते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, जबकि रुपये सहित अन्य मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है; कई अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं ने भी इसी प्रकार के दबाव का सामना किया है। इसलिए रुपये की गिरावट को किसी घरेलू नीति विफलता के रूप में नहीं, बल्कि एक मजबूत डॉलर चक्र के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने भी रुपये पर बाहरी दबाव को और गहरा किया है। वैश्विक संघर्ष, व्यापारिक तनाव और बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता को बढ़ा दिया है। ऐसी अनिश्चितता निवेशकों को जोखिम से बचने की रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित करती है, जिसके तहत वे उभरते बाजारों से निवेश निकालकर सुरक्षित मानी जाने वाली परिसंपत्तियों, विशेषकर अमेरिकी डॉलर, की ओर बढ़ते हैं। भारत, अपनी सापेक्ष स्थिरता के बावजूद, इस वैश्विक पूँजी पुनर्वितरण से अछूता नहीं रह सकता। आर्थिक सर्वेक्षण में यह उल्लेख किया गया है कि भारत एक तरह से “भू-राजनीति का शिकार” बन गया है, जहाँ मुद्रा की चाल घरेलू आर्थिक संकेतकों से अधिक वैश्विक जोखिम धारणा पर निर्भर हो गई है।

भारत की व्यापार संरचना और ऊर्जा आयात पर निर्भरता भी एक महत्वपूर्ण बाहरी कमजोरी के रूप में सामने आती है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का आयात करता है, जिनकी कीमतें अमेरिकी डॉलर में तय होती हैं। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ती हैं या डॉलर मजबूत होता है, तो भारत का आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे चालू खाते पर दबाव पड़ता है और रुपये की स्थिति कमजोर होती है। कई बार निर्यात में सुधार होने के बावजूद बढ़ी हुई आयात लागत उस लाभ को समाप्त कर देती है, जिससे व्यापार के माध्यम से रुपये को स्थिर करने की क्षमता सीमित हो जाती है।

रुपये के कमजोर प्रदर्शन का एक अन्य कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की प्रवृत्तियों से भी जुड़ा हुआ है। हाल के वर्षों में वैश्विक अनिश्चितता के दौर में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजारों से बड़ी मात्रा में पूँजी निकाली है। यद्यपि घरेलू संस्थागत निवेशक, जैसे म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियाँ- इन निकासी को आंशिक रूप से संतुलित करने में सफल रहे हैं, फिर भी वे पूरी तरह से बड़े पैमाने पर हुए विदेशी निवेश बहिर्गमन की भरपाई नहीं कर सकते। खासकर वैश्विक वित्तीय तनाव के समय, ऐसी निकासी रुपये की धारणा और स्थिरता दोनों को प्रभावित करती है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, जो सामान्यतः पोर्टफोलियो निवेश की तुलना में अधिक स्थिर माना जाता है, उसमें भी हाल के समय में कुछ नरमी देखने को मिली है। वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि, विश्व अर्थव्यवस्था की धीमी गति और बढ़ते संरक्षणवाद के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दीर्घकालिक निवेश को लेकर अधिक सतर्क हो गई हैं। हालांकि भारत अपने बड़े बाजार, अनुकूल जनसांख्यिकीय संरचना और सुधारोन्मुख नीतियों के कारण अब भी एक आकर्षक निवेश गंतव्य बना हुआ है, फिर भी वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों ने एफडीआई की रफ्तार को सीमित किया है। यह स्थिति भी रुपये पर बाहरी दबाव बढ़ाने का काम करती है।

व्यापार नीति से जुड़ी अनिश्चितताएँ, विशेष रूप से बड़े देशों द्वारा संभावित टैरिफ बढ़ोतरी, भी एक गंभीर बाहरी जोखिम के रूप में उभरती हैं। आर्थिक सर्वेक्षण ने इस बात की ओर संकेत किया है कि अमेरिका जैसे देशों द्वारा संरक्षणवादी कदम उठाए जाने की आशंका वैश्विक व्यापार को बाधित कर सकती है। इससे भारत के निर्यात-आधारित क्षेत्रों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और विदेशी मुद्रा आय में कमी आ सकती है। कई बार केवल ऐसी नीतियों की आशंका मात्र से ही निवेशकों का व्यवहार बदल जाता है, जिससे किसी वास्तविक नीति परिवर्तन से पहले ही मुद्रा में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है।

इन सभी चुनौतियों के बावजूद आर्थिक सर्वेक्षण इस बात पर जोर देता है कि भारत की घरेलू आर्थिक बुनियाद अब भी मजबूत बनी हुई है। भारत की विकास दर कई प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर है, महँगाई सामान्य रूप से नियंत्रण में है और विदेशी मुद्रा भंडार बाहरी झटकों से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इसलिए रुपये की कमजोरी को व्यापक आर्थिक अस्थिरता का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। यह स्थिति इस तथ्य को दर्शाती है कि आज की वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में मजबूत अर्थव्यवस्थाएँ भी बाहरी शक्तियों के प्रभाव से पूरी तरह बच नहीं सकतीं।

रुपये की अस्थिरता से निपटने का उपाय निराशावादी दृष्टिकोण अपनाने में नहीं, बल्कि रणनीतिक तैयारी में निहित है। नीति-निर्माताओं को बाहरी सुरक्षा उपायों को मजबूत करने, निर्यात बाजारों में विविधता लाने और स्थिर, दीर्घकालिक पूँजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने पर ध्यान देना होगा। विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना, सेवा निर्यात का विस्तार करना और अस्थिर पोर्टफोलियो निवेश पर निर्भरता कम करना धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था की सहनशीलता को बढ़ा सकता है। साथ ही, नीतिगत विश्वसनीयता, राजकोषीय अनुशासन और संस्थागत स्थिरता बनाए रखना वैश्विक उथल-पुथल के दौर में निवेशकों का भरोसा कायम रखने के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।

अब यह स्पष्ट है कि भारतीय रुपये के सामने खड़ी अधिकांश चुनौतियाँ बाहरी प्रकृति की हैं, जो वैश्विक मौद्रिक सख्ती, पूँजी प्रवाह की अस्थिरता, भू-राजनीतिक जोखिमों और व्यापारिक अनिश्चितताओं से जुड़ी हुई हैं। ये कारक समय-समय पर रुपये पर दबाव डाल सकते हैं, लेकिन वे भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल मजबूती को कमजोर नहीं करते। इस अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है, ताकि अनावश्यक निराशा से बचा जा सके और मुद्रा की चाल को एक तेजी से बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के व्यापक संदर्भ में सही ढंग से देखा जा सके।
(स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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